क्या सच्चा साधु बनने के लिए हिमालय जाना जरूरी है? क्या संसार की जिम्मेदारियों को छोड़ देना ही मुक्ति का एकमात्र रास्ता है?
पिछले अध्याय में हमने देखा कि ज्ञान की तलवार से संशय (शंका) को काट देना है। लेकिन अर्जुन, हमारी ही तरह, फिर से उलझन में पड़ जाता है। उसके मन में सवाल उठता है, “हे कृष्ण! एक तरफ आप कर्मों का त्याग (संन्यास) करने को कहते हैं और दूसरी तरफ कर्म करने की बात करते हैं। इन दोनों में से श्रेष्ठ क्या है?”
हम भी अक्सर ऐसी ही दुविधा में जीते हैं। सोशल मीडिया पर दूसरों का ‘वेकेशन मोड’ देखकर या ऑफिस के काम के बोझ से तंग आकर हमें लगता है कि “सब कुछ छोड़कर कहीं भाग जाएं!” लेकिन श्रीकृष्ण इस अध्याय में समझाते हैं कि सच्चा संन्यास भागने की प्रवृत्ति (पलायनवाद) नहीं, बल्कि एक आंतरिक कला है।
कृष्ण अर्जुन से बहुत स्पष्ट शब्दों में कहते हैं:”कर्म का संन्यास (सब कुछ छोड़ देना) और कर्मयोग (अनासक्त होकर कर्म करना) ये दोनों ही परम कल्याण करने वाले हैं। लेकिन इन दोनों में कर्मसंन्यास की तुलना में कर्मयोग श्रेष्ठ है।”
भगवान समझाते हैं कि जो व्यक्ति न तो किसी से द्वेष करता है और न ही कोई आकांक्षा (इच्छा) रखता है, वह घर में रहकर, संसार के सारे कार्य करते हुए भी नित्य संन्यासी ही है। सच्चा त्याग कपड़े बदलने में नहीं, बल्कि मन का दृष्टिकोण बदलने में है।
दीये की लौ और हवा: तटस्थता का नया गणित
जब हम संसार में काम करते हैं, तो हमारा मन इच्छाओं और उम्मीदों की हवा से लगातार डगमगाता रहता है। मान लीजिए कि एक कांच की लालटेन के अंदर दीया जल रहा है। बाहर चाहे कितनी भी तेज आंधी या तूफान चल रहा हो, लेकिन कांच की दीवार के कारण अंदर की लौ स्थिर रहती है, वह जरा भी नहीं डगमगाती।
हमारा जीवन भी ऐसा ही होना चाहिए। आस-पास कितनी भी भागदौड़, नकारात्मकता या प्रशंसा की हवा चल रही हो, लेकिन हमारी आंतरिक शांति परमात्मा के स्मरण रूपी ‘कांच के कवच’ से सुरक्षित होनी चाहिए। कर्म कीजिए, लेकिन बाहर के वातावरण को अपनी आंतरिक स्थिरता डिगाने मत दीजिए।
समदर्शी बुद्धि: सोने की जंजीर और लोहे की बेड़ी
इस अध्याय में कृष्ण समदृष्टि की बात करते हैं। हम अक्सर अच्छे परिणाम से बहुत खुश हो जाते हैं और बुरे परिणाम से टूट जाते हैं। बेड़ी (हथकड़ी) लोहे की हो या सोने की, वह इंसान को बांधकर ही रखती है। लोहे की बेड़ी यानी दुःख और सोने की बेड़ी यानी सुख और अहंकार।
सच्चा ज्ञानी वही है जो समझता है कि दोनों अंततः बंधन ही हैं। इसीलिए, कृष्ण कहते हैं कि सच्चा ज्ञानी पुरुष एक विद्वान ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और चांडाल सब में एक ही परमात्मा के अंश को देखता है। जब आप सामने वाले व्यक्ति के पद, प्रतिष्ठा या जाति को नहीं, बल्कि उसके भीतर की इंसानियत को देखते हैं, तब आपके आधे प्रश्न अपने आप सुलझ जाते हैं।
काम-क्रोध के वेग को जीतना: समुद्र और नदियों का गूढ़ रहस्य
इस अध्याय के 23वें श्लोक में कृष्ण कहते हैं कि जो व्यक्ति इस शरीर में रहते हुए ही, शरीर छूटने (मृत्यु) से पहले काम और क्रोध से उत्पन्न होने वाले वेग को सहन करने में समर्थ हो जाता है, वही सुखी है।
विचार कीजिए, मानसून में देश भर की नदियां अपने पूरे उफान और वेग के साथ समुद्र में जाकर मिलती हैं। लेकिन समुद्र उन सभी नदियों के वेग को अपने भीतर समाहित कर लेता है, फिर भी वह अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता और न ही उफनकर बाहर आता है।
हमारा मन भी इसी समुद्र की तरह गंभीर होना चाहिए। दैनिक जीवन में अपमान, गुस्सा या इच्छाओं की नदियां हमारे मन में बहकर आएंगी, लेकिन हमें समुद्र की तरह शांत रहकर उस वेग को पचा लेना है, बाहर उफनकर किसी का नुकसान नहीं करना है।
सुख का सच्चा सोर्स (Source) कहां है?
हम सभी बाहरी चीजों में सुख ढूंढ रहे हैं। लेकिन कृष्ण कहते हैं कि बाहरी विषयों से मिलने वाला सुख तो क्षणभंगुर (नष्ट होने वाला) है और वही दुःख का कारण भी है। सच्चा और स्थायी सुख तो हमारे भीतर ही है।
अध्याय के अंत में कृष्ण हमें आंतरिक शांति का परम मंत्र देते हैं कि भगवान को अपना परम मित्र (सुहृद) मानकर सब कुछ उन्हें अर्पित कर देना चाहिए।
सब कुछ छोड़कर जंगल में जाने की जरूरत नहीं है। घर में रहकर, अपनी जिम्मेदारियों को पूरी निष्ठा से निभाते हुए, बस परिणाम की चिंता ईश्वर पर छोड़ देना ही सच्चा ‘कर्मसंन्यास’ है।
(क्रमशःआगामी अध्याय 6 में हम समझेंगे ‘आत्मसंयम योग’— मन को कंट्रोल कैसे करें? सोशल मीडिया और डिस्ट्रैक्शन के जमाने में मन की एकाग्रता का साइंस।) दर्शना पटेल (नेशनल अवार्ड से सम्मानित) स्पोर्ट्स टीचर।

