महज दो साल में ही करोड़ों की लागत से बनी सड़कों की हालत जर्जर होने से वाहन चालकों और आम जनता में भड़का आक्रोश
सरकारी तिजोरी से पानी की तरह बहाए गए भारी-भरकम धन के बावजूद जवाबदेही किसकी? इस पर तंत्र पूरी तरह मौन
अहमदाबाद/जामनगर : देश के बुनियादी ढांचे और कनेक्टिविटी को मजबूत करने के लिए सरकार द्वारा अरबों-खरबों रुपए के प्रोजेक्ट्स घोषित किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कितनी खोखली होती है, इसका एक बेहतरीन उदाहरण हाल ही में चर्चा में आया है। गुजरात के औद्योगिक शहर माने जाने वाले जामनगर से लेकर देश के चंडीगढ़ तक के अत्याधुनिक और महत्वाकांक्षी सिक्स-लेन (Six-Lane) हाईवे प्रोजेक्ट को लेकर अब बेहद गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। भारी-भरकम ₹80,000 करोड़ की लागत से तैयार हुए इस मार्ग पर अभी बमुश्किल दो साल का समय बीता है कि सड़कों की गुणवत्ता पर बड़े प्रश्नचिह्न लग गए हैं।
क्या महज दो साल में ही बह गई गुणवत्ता?
प्राप्त जानकारियों और स्थानीय रिपोर्टों के मुताबिक, इतने बड़े आर्थिक निवेश के बाद तैयार हुए इस हाईवे पर अभी से गड्ढे पड़ने शुरू हो गए हैं और सड़क की सतह उखड़ने लगी है। करोड़ों रुपए के टैक्स के पैसों से तैयार होने वाले ऐसे राष्ट्रीय राजमार्ग यदि मात्र दो साल के भीतर ही जर्जर होने लगें, तो यह तकनीकी खामी है या फिर भ्रष्टाचार का परिणाम? यह जांच का एक बड़ा विषय बन गया है। हाईवे पर गाड़ियां दौड़ाने वाले चालक और ट्रांसपोर्टर भी बार-बार पेश आने वाली असुविधा और दुर्घटना के जोखिम से त्रस्त हो चुके हैं।
जवाबदेही किसकी? और ठेकेदारों के खिलाफ चुप्पी क्यों?
इतनी बड़ी रकम खर्च करने के बाद भी यदि जनता को गुणवत्तापूर्ण और सुरक्षित सड़क नहीं मिल पा रही है, तो इस प्रोजेक्ट से जुड़ी एजेंसियों, इंजीनियरों और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय क्यों नहीं की जा रही है? ऐसे सवाल अब जागरूक नागरिकों द्वारा पूछे जा रहे हैं। सरकारी योजनाओं में होने वाले भारी खर्च के मुकाबले यदि बुनियादी गुणवत्ता ही न बचे, तो विकास के दावे सिर्फ कागजी साबित होते हैं।
महानगर मेट्रो का सवाल: जनता की गाढ़ी कमाई और टैक्स के पैसों से बनने वाले ऐसे विकास कार्यों में पारदर्शिता कब आएगी और भ्रष्टाचार करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई कब होगी?

