राष्ट्र और प्रजा की रक्षा में अपनों को खोने वाले शहीद परिवारों के चरण चूमती नजर आई देश की सर्वोच्च संवेदना
नेताओं, प्रशासनिक अमले और आम नागरिकों के लिए यह घटना कर्तव्यबोध का सबसे बड़ा पाठ है
नई दिल्ली/विशेष रिपोर्ट : इस दुनिया में अपनों को खोने का दर्द क्या होता है, यह वही परिवार जानता है जिसका कोई चिराग देश की सरहदों या आंतरिक सुरक्षा की रक्षा करते हुए हमेशा के लिए बुझ जाता है। ऐसे ही वीर शहीदों के परिजनों को सम्मानित करने के लिए जब देश की महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अपने पद की गरिमा और प्रोटोकॉल की औपचारिकताओं को दरकिनार कर खुद चलकर आगे कदम बढ़ाया, तो यह दृश्य सिर्फ एक औपचारिकता नहीं, बल्कि राष्ट्र की सच्ची श्रद्धांजलि बन गया।
प्रोटोकॉल से ऊपर उठीं राष्ट्रपति की संवेदनाएं
सामान्य तौर पर देश के सर्वोच्च संवैधानिक पदों पर बैठे विशिष्ट महानुभावों के लिए तयशुदा प्रोटोकॉल और सुरक्षा घेरे होते हैं, जिनके दायरे में रहकर ही उन्हें चलना होता है। लेकिन राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इन तमाम लकीरों और सीमाओं को पीछे छोड़ते हुए यह साबित कर दिया कि राष्ट्र के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने वाले शहीदों के परिजनों से बड़ा इस देश में कोई प्रोटोकॉल नहीं हो सकता। उन्होंने खुद अपनी जगह से उठकर, मंच या तय दायरे की औपचारिकता को तोड़ते हुए शहीद परिवारों के पास जाकर उन्हें जो मान-सम्मान दिया, उसने वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम कर दीं।
जिन्होंने राष्ट्र के लिए अपना सब कुछ होम कर दिया
जिन्होंने अपने घर का बेटा, अपनी कोख का पुत्र, किसी ने अपनी बेटी, किसी ने अपने सिर का ताज (पति), तो किसी ने अपना भाई या बहन देश की रक्षा के खातिर कुर्बान कर दिए, वे परिवार समाज और राष्ट्र की सबसे अमूल्य पूंजी हैं। जब ऐसे शोकसंतप्त और गौरवान्वित परिवारों को देश के सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा इस स्तर का आत्मीय सम्मान मिलता है, तो यह उनके जख्मों पर मरहम का काम तो करता ही है, साथ ही पूरे देश को यह संदेश भी देता है कि पूरा राष्ट्र उनके साथ खड़ा है।
नेताओं, सरकारी तंत्र और समाज के लिए एक तमाचा और सीख
आज के दौर में जब कई बार राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में प्रोटोकॉल और अहंकार को सर्वोपरि मान लिया जाता है, तब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का यह आचरण हर नुमाइंदे, सरकारी कर्मचारी और आम नागरिक के लिए एक आईना है। यह घटना हमें सिखाती है कि कुर्सी और पद अस्थायी हैं, लेकिन देश और शहीदों के प्रति कृतज्ञता की भावना ही सबसे बड़ी मानवीय और राष्ट्रीय पूंजी है।
महानगर मेट्रो का विशेष दृष्टिकोण: राष्ट्र की सुरक्षा के लिए अपनी पीढ़ियों को होम कर देने वाले शहीद परिवारों का सम्मान ही देश की असली ताकत है। राष्ट्रपति का यह कदम महज़ एक खबर नहीं, बल्कि हर भारतीय के भीतर देशभक्ति और संवेदनाओं को झकझोर देने वाला एक ऐतिहासिक प्रसंग है। मानना या न मानना आपकी सोच पर निर्भर हो सकता है, लेकिन यह सच्चाई अकाल और शाश्वत है कि शहीद और उनके परिवार इस देश के असली नायक हैं।

