बनासकांठा। गुजरात की राजनीति में एक समय कांग्रेस की ही आवाज माने जाने वाले और वर्तमान में भाजपा के प्रखर नेता जयराजसिंह परमार ने महानगर मेट्रो समाचार के साथ एक विशेष बातचीत में कांग्रेस की आंतरिक खींचतान पर ऐसा कटाक्ष किया है जिससे राज्य के राजनीतिक गलियारों में बड़ी गर्माहट आ गई है। प्रदेश से लेकर जिला स्तर तक कांग्रेस में पैदा हुए हालिया विवादों पर बोलते हुए उन्होंने तीखा आरोप लगाया कि कांग्रेस का प्रिय खेल आपस में लड़ना है।
बनासकांठा जिला कांग्रेस संगठन को लेकर पैदा हुए आंतरिक मतभेद और गुटबाजी जब हर नुक्कड़ और चौराहे पर चर्चा का विषय बनी हुई है, तब जयराजसिंह का यह बयान कांग्रेस के लिए आग में घी डालने के समान साबित हुआ है।
बनासकांठा कांग्रेस का विवाद भाजपा के लिए फायदा उठाने का अवसर बन गया है। बनासकांठा, जो एक समय कांग्रेस का मजबूत गढ़ माना जाता था, वहां संगठन के ढांचे और पदाधिकारियों की नियुक्ति को लेकर नेता आपस में आमने-सामने आ गए हैं।
जिला स्तर पर पदों और सत्ता के बंटवारे के मुद्दे पर पैदा हुई दरारें अब केवल बंद दरवाजों के पीछे नहीं, बल्कि सार्वजनिक चर्चा का विषय बन गई हैं।
जयराजसिंह परमार स्वयं दशकों तक कांग्रेस के संगठन में रह चुके हैं, इसलिए वे कांग्रेस के भीतर की कमजोरियों और मानसिकता से बहुत अच्छी तरह
वाकिफ हैं। जब वे यह बयान देते हैं, तब यह केवल एक राजनीतिक प्रहार नहीं रह जाता बल्कि कांग्रेस की पुरानी बीमारी पर सीधी उंगली उठाने के समान बन जाता है।
महानगर मेट्रो का विश्लेषण है कि इस टिप्पणी को दो अलग-अलग दृष्टिकोणों से जाँचना आवश्यक है:
पहला है कांग्रेस की वास्तविकता और कड़वा सच। कांग्रेस दल के लिए चुनाव जीतने से पहले अपने ही नेताओं को संभालना एक बड़ी चुनौती बन गया है। कार्यकर्ता जब जनता के सवालों के लिए लड़ने के बजाय पदों के लिए आपस में लड़ते हैं, तब जनता का विश्वास डगमगा जाता है। भाजपा इसी कमजोरी का राजनीतिक लाभ उठा रही है।
दूसरा है भाजपा की विमर्श बनाने की राजनीति। भाजपा के नेता बहुत ही योजनाबद्ध तरीके से जनता के सामने यह विमर्श स्थापित कर रहे हैं कि कांग्रेस एक बिखरा हुआ घर है जो देश या राज्य का नेतृत्व करने में सक्षम नहीं है। जयराजसिंह जैसे पूर्व कांग्रेसी नेता का उपयोग करके भाजपा इस आवाज को और अधिक धारदार बना रही है।
महानगर मेट्रो के तीखे सवाल हैं कि बनासकांठा जैसे महत्वपूर्ण जिले में आंतरिक विवाद शांत करने में प्रदेश कांग्रेस आलाकमान क्यों विफल साबित हो रहा है? विपक्ष के रूप में जनता के मुद्दे उठाने के समय आपस में लड़कर क्या कांग्रेस स्वयं ही भाजपा को निर्विरोध जगह दे रही है?
अगर कांग्रेस अपने आंतरिक मतभेदों और आपस में लड़ने के खेल को तत्काल बंद नहीं करती है, तो आगामी राजनीतिक लड़ाइयों में जनता उसे गंभीरता से लेना बिल्कुल बंद कर देगी, इसमें कोई संदेह नहीं है।

