अहमदाबाद। पूर्व जस्टिस मार्कंडेय काट्जू का वह विवादित बयान आज भी चर्चाओं में रहता है जिसमें उन्होंने भारतीयों की समझ पर सवाल उठाए थे। आज जब हम नर्मदा नदी में दूध बहाते या पल्ली जैसे उत्सवों में सड़कों पर टनों घी बहते देखते हैं, तो अनायास ही यह सवाल खड़ा होता है कि क्या हम अनजाने में उनके उन तर्कों को सही साबित कर रहे हैं?
आस्था के नाम पर संसाधनों की बर्बादी
भारत एक ऐसा देश है जहां एक तरफ करोड़ों बच्चे कुपोषण की मार झेल रहे हैं, जिन्हें एक वक्त का पौष्टिक भोजन नसीब नहीं होता। दूसरी तरफ, धर्म और परंपरा के नाम पर हजारों लीटर दूध नदियों में बहा दिया जाता है और शुद्ध घी सड़कों पर व्यर्थ कर दिया जाता है। क्या हमारी आस्था इतनी संकीर्ण हो गई है कि हमें बर्बादी में ही पुण्य नजर आता है?
मानवता की सेवा ही सच्चा धर्म
यदि यही दूध और घी बर्बाद करने के बजाय, उससे दही या पनीर जैसी पौष्टिक चीजें बनाकर कुपोषित बच्चों में बांट दी जाती, तो शायद उन मासूमों के चेहरे की मुस्कान ईश्वर की सबसे बड़ी सेवा होती। धर्म का असली अर्थ परोपकार है, न कि प्राकृतिक संसाधनों का अपव्यय। विडंबना यह है कि आधुनिक युग में भी ‘धर्मांधता’ के कारण हम इस वैज्ञानिक और मानवीय दृष्टिकोण को अपनाने में विफल रहे हैं।
शासन और समाज की जिम्मेदारी
दुखद पहलू यह भी है कि समाज को सही दिशा दिखाने के बजाय, कई बार सत्ता और शासन से जुड़े लोग भी ऐसी अंधश्रद्धाओं को संरक्षण या प्रोत्साहन देते नजर आते हैं। जब तार्किकता के स्थान पर अंधविश्वास को बढ़ावा मिलता है, तो देश प्रगति की दौड़ में सदियों पीछे छूट जाता है।
हमें यह समझने की जरूरत है कि पत्थर या पानी पर चढ़ाया गया प्रसाद तब तक सार्थक नहीं है, जब तक हमारे समाज का एक बड़ा हिस्सा भूख और कुपोषण से लड़ रहा है। अब समय आ गया है कि हम अपनी परंपराओं को तर्क और मानवता की कसौटी पर कसें।

