अहमदाबाद/मुंबई।गुजरात और महाराष्ट्र की धरती पर जब भी दो लोग एक-दूसरे से मिलते हैं, तो हवाओं में एक गूंज सुनाई देती है— ‘जय भीम’। यह मात्र दो शब्द नहीं हैं, बल्कि बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के प्रति अटूट श्रद्धा, उनके संघर्षों की याद और सामाजिक समानता के संकल्प का प्रतीक बन चुके हैं।
लाखों कार्यकर्ताओं की सामूहिक पहचान
गुजरात और महाराष्ट्र में अंबेडकरवादी आंदोलन से जुड़े लाखों कार्यकर्ता और बाबासाहेब के विचारों के प्रति भावनात्मक लगाव रखने वाले लोग एक-दूसरे का अभिवादन ‘जय भीम’ कहकर करते हैं। आज यह संबोधन एक वैश्विक पहचान बन चुका है, जो शोषितों और वंचितों के भीतर स्वाभिमान की भावना जगाता है।
वैचारिक क्रांति का आधार
इस अभिवादन की जड़ें केवल औपचारिकता में नहीं, बल्कि उस वैचारिक क्रांति में हैं जिसे डॉ. अंबेडकर ने शुरू किया था। महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों में, जहाँ सामाजिक चेतना के आंदोलनों का लंबा इतिहास रहा है, वहां ‘जय भीम’ कहना आपसी भाईचारे और संवैधानिक मूल्यों के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त करने का एक जरिया है।
भावनात्मक जुड़ाव और सम्मान
आंबेडकरवादी समाज के लिए बाबासाहेब एक मसीहा के समान हैं। उनसे जुड़ाव रखने वाले लोग जब ‘जय भीम’ कहते हैं, तो वे असल में बाबासाहेब द्वारा दिखाए गए शिक्षित होने, संगठित रहने और संघर्ष करने के मार्ग को दोहराते हैं। यह शब्द छोटे-बड़े के भेदभाव को मिटाकर सबको एक ही कतार में खड़ा कर देता है।
महानगर मेट्रो की इस विशेष रिपोर्ट के माध्यम से हम उस सामाजिक समरसता और चेतना को सलाम करते हैं, जो इन दो शब्दों के माध्यम से समाज के अंतिम छोर तक पहुंच रही है।
जय भीम, जय भारत।

