अहमदाबाद।आज से ठीक 42 साल पहले, 13 अप्रैल 1984 के उस ऐतिहासिक दिन ने भारतीय सैन्य इतिहास में अदम्य साहस की एक नई इबारत लिखी थी। भारतीय सेना ने ‘ऑपरेशन मेघदूत’ के तहत सामरिक दृष्टि से विश्व के सबसे ऊंचे और दुर्गम युद्ध क्षेत्र ‘सियाचिन ग्लेशियर’ पर अपना आधिपत्य स्थापित कर तिरंगा फहराया था।
ऑपरेशन मेघदूत: असंभव को संभव बनाने की गाथा
आज ही के दिन तड़के 4:30 बजे, जब दुनिया गहरी नींद में थी, कैप्टन कुलकर्णी और उनके जांबाज सैनिकों ने चेतक हेलीकॉप्टर के जरिए सियाचिन की अभेद्य चोटियों पर कदम रखा था। 17,000 से 22,000 फीट की अत्यधिक ऊंचाई पर स्थित यह क्षेत्र किसी चुनौती से कम नहीं था। शून्य से 15 डिग्री नीचे से लेकर -60 डिग्री तक गिरता तापमान और 80 से 150 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाली बर्फीली हवाएं, जहाँ सांस लेना भी दूभर होता है, वहां हमारे जवानों ने अपने पराक्रम से दुश्मन के मंसूबों को नाकाम कर दिया।
अहमदाबाद के लाडले कैप्टन निलेश सोनी का अमर बलिदान
सियाचिन की रक्षा की इस गौरवशाली परंपरा में हमारे शहर अहमदाबाद का नाम भी स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। 62 मीडियम रेजिमेंट के जांबाज कैप्टन निलेश सोनी ने सियाचिन की दुर्गम वादियों में पाकिस्तानी सेना का डटकर मुकाबला किया। 12 फरवरी 1987 को मातृभूमि की रक्षा करते हुए उन्होंने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया और वीरगति को प्राप्त हुए। कैप्टन सोनी का यह बलिदान आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।
विषम परिस्थितियां और अटूट कर्तव्यनिष्ठा
सियाचिन का युद्ध केवल दुश्मन से नहीं, बल्कि प्रकृति की कठोरता से भी है। ऑक्सीजन की कमी, हिमस्खलन का डर और हाड़ कंपा देने वाली ठंड के बीच भारतीय सैनिक आज भी 24 घंटे मुस्तैद रहते हैं। राष्ट्र और प्रजा की सुरक्षा के लिए उनकी यह अटूट प्रतिबद्धता ही है जो हमें चैन की नींद सोने का अवसर देती है।
महानगर मेट्रो उन सभी वीर सैनिकों को कोटि-कोटि नमन करता है जिन्होंने इस दुर्गम रणक्षेत्र में अपना कर्तव्य निभाया, जो आज भी वहां तैनात हैं और जिन्होंने देश की अखंडता के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
जय हिंद!

