मिहिर आहूजा, मनोज पाहवा, नीलू कोहली और ऑरा भटनागर स्टारर ‘दिलवाली दिवाली’ OTT प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स पर रिलीज हो गई है। रितेश मेनन के डायरेक्शन में बनी यह फिल्म कैसी है, जानने के लिए ये रिव्यू पढ़ें-
दिवाली का त्योहार आ गया है, इसलिए OTT पर भी इसकी रौनक खूब नजर आ रही है। बीते हफ्ते आई ‘मीठे में क्या है’ के बाद अब दीपावाली के इर्द-गिर्द बुनी गई एक और फैमिली फिल्म ‘दिलवाली दिवाली’ रिलीज हो चुकी है। Netflix पर आई रितेश मेनन निर्देशित यह फिल्म इस बात पर जोर देती है कि घर असल में सिर्फ आलिशान दीवारों, साज-सज्जा और सुख-सुविधाओं से नहीं बनता, बल्कि वहां रहने वाले लोगों और उनके अपनेपन के रिश्तों से बनता है।
‘दिलवाली दिवाली’ की कहानी
कहानी अंश सिक्का (मिहिर आहूजा) की है, जो नॉर्वे में नौकरी करता है। अंश अपने माता-पिता सुधीर (मनोज पाहवा) और सुखमनी (नीलू कोहली) को सुविधा सपन्न जिंदगी देने के लिए पॉश इलाके में एक आलीशान अपार्टमेंट खरीदता है, लेकिन उसके माता-पिता को अपने पुराने घर, मोहल्ले और वहां के लोगों से ज्यादा लगाव है। उन्हें नए घर की चमक-दमक और वहां की अपने तक सीमित रहने वाली आधुनिक जीवनशैली रास नहीं आती।
हालांकि, बेटे का दिल न दुखे, इसलिए सुधीर और सुखमनी नए अपार्टमेंट में बहुत खुश होने का दिखावा करते हैं। लेकिन मुश्किल तब बढ़ जाती है, जब अंश दिवाली में घर आता है और परिवार के सामने उससे सच छिपाने की चुनौती आ जाती है। इधर, अंश की भी अपनी कुछ आर्थिक चुनौतियां हैं। ऐसे में दोनों के राज़ इस परिवार को किस तरह जोड़ते हैं, यह फिल्म का ताना-बाना है।
‘दिलवाली दिवाली’ मूवी रिव्यू
रितु मागो की यह कहानी घर, अपनापन और पीढ़ियों के बीच बदलती सोच को दिखाती है। लोग अक्सर यह शिकायत करते हैं कि वे मां-बाप को शहर में लाकर अच्छी जिंदगी देना चाहते हैं, लेकिन वे आने को तैयार ही नहीं हैं या उन्हें गांव ही भाता है। हालांकि, माता-पिता के लिए अच्छा सोचते वक्त वे यह भूल जाते हैं कि उनकी असल खुशी कहां है। इसलिए, माता-पिता की सुख-सुविधा के बारे में सोचते वक्त यह समझना भी जरूरी है कि उनके लिए असल खुशी एक बड़े घर के बजाय अपने पुराने यार-दोस्तों और पड़ोसियों का साथ, उनके सुख-दुख बांटना, उनकी छोटी-छोटी खुशियों में शामिल होना है।
डायरेक्टर रितेश मेनन की इस फिल्म का विचार प्यार और अच्छा है। लेकिन फिल्म को बड़ी हड़बड़ी में समेटने की कोशिश की गई है। यह जल्दबाजी ही इसकी सबसे बड़ी कमजोरी है। सिर्फ 61 मिनट की छोटी सी अवधि में फिल्म कई भावनाओं पहलुओं को असरदार तरीके से नहीं दिखा पाती। फिल्म की पटकथा को ज्यादा विस्तार और गहराई मिली होती तो फिल्म और उसका संदेश ज्यादा प्रभावी बन सकते थे।
अभिनय की बात करें तो मनोज पाहवा अपने सहज अंदाज और कॉमिक टाइमिंग से फिल्म में रंग भरते हैं। नीलू कोहली भी मां सुखमनी के किरदार में स्वाभाविक लगी हैं। जबकि, मिहिर आहूजा एक महत्वाकांक्षी, लेकिन भावुक बेटे के रूप में जंचते हैं। पर उनका इमोशनल आर्क और ज्यादा बेहतर हो सकता था। इसी तरह, बहन बनी औरा भटनागर बडोनी को ज्यादा मौका नहीं मिला है।
कुल मिलाकर, ‘दिलवाली दिवाली’ एक अच्छे संदेश वाली हल्की-फुल्की पारिवारिक फिल्म है, जो अपनी पूरी क्षमता तक नहीं पहुंच पाती। फिर भी, खाली समय में टाइमपास के लिए आप इसे ओटीटी पर देख सकते हैं।

