दिवाली रोशनी का त्योहार है, उत्साह का त्योहार है और मुंह मीठा करने का मौका है। लेकिन रुककर सोचिए, क्या इस पवित्र त्योहार में हम जो मिठाइयां खा रहे हैं, वे सच में मीठी हैं या परिवार की सेहत के लिए ‘धीमा ज़हर’ हैं? हर दिन अखबारों और न्यूज़ चैनलों में फूड सेफ्टी डिपार्टमेंट की रेड की खबरें आती हैं—कभी नकली मावा पकड़ा जाता है, कभी सिंथेटिक दूध या चांदी के नाम पर एल्युमिनियम फॉयल पकड़ा जाता है। हम सिस्टम को कोसते हैं और मान लेते हैं कि “सरकार क्या कर रही है?” लेकिन कड़वा सच यह है कि सिस्टम या सरकार गलत नहीं है, गलत तो हमारी अपनी सोच और चैरिटी है! यह पाप दशकों से चल रहा है और हम ही हैं जो इसे जाने देते हैं।
मिलावट मावे में नहीं, हमारी चैरिटी में है!
जब आप बाज़ार में काजू खरीदने जाते हैं, तो सवाल उठता है कि भाई, इसमें काजू कम और मूंगफली या मूंगफली का पाउडर ज़्यादा क्यों है? मावा के नाम पर बिकने वाले प्रोडक्ट्स में गंदी, बासी और सड़ी हुई चीज़ों का मिक्सचर होता है। दुकान में मिठाइयाँ देखने में सुंदर और आकर्षक लगती हैं, लेकिन जैसे ही आप उन्हें मुँह में डालते हैं, आपका गला बंद हो जाता है, आपको खांसी आती है या आपका गला अटक जाता है—लगभग हम सभी ने कभी न कभी ऐसा अनुभव किया होगा। फिर भी हम चुप रहते हैं। क्यों? क्योंकि हमें सस्ता चाहिए!
दिखावटी रिश्ते और सस्ती चीज़ों का क्रेज़
आजकल रिश्ते भी एक ‘फॉर्मैलिटी’ बन गए हैं। चाहे ऑफिस में गिफ्ट देना हो, दूर के रिश्तेदारों को बॉक्स भेजना हो या सोशल स्टेटस बनाए रखना हो; हमें हर जगह ‘सस्ता और ज़्यादा’ चाहिए। एक ही दुकान में एक जैसी दिखने वाली मिठाइयों के दो अलग-अलग दाम क्यों होते हैं? एक बॉक्स 600 रूपये प्रति किलो मिलता है और दूसरी क्वालिटी उसके बगल में 1200 रूपये प्रति किलो बिकती है। इस असमानता का जवाब हर समझदार इंसान जानता है। 600 रुपये की मिठाई में असली काजू का पेस्ट कहाँ से आता है? वहाँ तो गैर-कानूनी और अंडरग्राउंड फैक्ट्रियों का वही ज़हरीला पेस्ट इस्तेमाल होता है जो गरीब और आम लोगों की सेहत के साथ खिलवाड़ करता है। सस्तेपन के पागलपन में हम खुद ही जान-बूझकर ज़हर खरीदकर घर ले आते हैं। सिस्टम को सूफी सलाह की नहीं, बल्कि आत्मनिरीक्षण की ज़रूरत है। हम हमेशा सिस्टम को लंबी-लंबी सलाह देते हैं कि छापे बढ़ाओ, कानून सख्त करो।
अरे भाई! जब तक हम कंज्यूमर के तौर पर खरीदने का तरीका नहीं बदलेगा, कोई भी सिस्टम इस पाप को नहीं रोक सकता। ऐसे गंदे बिजनेसमैन खुलेआम खेलते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि “हमारे देश में सस्ता दोगे तो कंज्यूमर की कमी नहीं होगी।” एक पवित्र त्योहार के नाम पर इस बिजनेस से अनजान रहकर हम अपने ही बच्चों और परिवारों की जान से खेल रहे हैं। अब समय आ गया है कि सूफी सलाह देना बंद करो और सीधे और असली सवाल पूछो। सस्तेपन की आड़ में ज़हर खरीदना बंद करो, नहीं तो यह धीमा ज़हर किलो में नहीं, बल्कि धीरे-धीरे एक पूरी पीढ़ी की सेहत खराब कर देगा। वरना, “गंदे धंधे पे धंधा है ये” वाली सोच के साथ जीने वालों को शायद कोई फर्क न पड़े, लेकिन सवाल यह है कि क्या आप अपने परिवार को यह ज़हर खिलाना चाहते हैं? फैसला आपका है!

