घाटे से उबारकर मुनाफे में लाए गए बैंक को कनाडाई कंपनी को बेचने की प्रक्रिया पर सवाल, न्यूनतम मूल्य से कम बोली स्वीकार करने और नियमों में बदलाव के आरोप; एलआईसी के पॉलिसीधारकों के हितों को लेकर भी उठी चिंता
विशेष रिपोर्ट। देश की बैंकिंग व्यवस्था में आईडीबीआई बैंक की हिस्सेदारी बिक्री को लेकर एक बड़ा विवाद सामने आया है। सार्वजनिक धन और भारतीय जीवन बीमा निगम के निवेश से संकट से उबरे इस बैंक को निजी क्षेत्र के हाथों सौंपने की प्रक्रिया पर कई गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। आरोप है कि जिस बैंक को कभी भारी घाटे और डूबे हुए कर्ज की समस्या से जूझना पड़ा था, उसी बैंक ने आर्थिक स्थिति सुधरने के बाद हजारों करोड़ रुपये का मुनाफा कमाया। इसके बावजूद सरकार की ओर से उसकी हिस्सेदारी बेचने का फैसला किया गया। इस पूरी प्रक्रिया में बिक्री मूल्य, बोली लगाने के नियमों और पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।
1964 में हुई थी स्थापना, बाद में वित्तीय संकट में फंसा बैंक
आईडीबीआई बैंक का इतिहास वर्ष 1964 से शुरू होता है। एक जुलाई 1964 को संसद के अधिनियम के तहत औद्योगिक विकास बैंक ऑफ इंडिया की स्थापना की गई थी। इसका प्रमुख उद्देश्य देश में औद्योगिक विकास को गति देना और उद्योगों को दीर्घकालीन वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना था। वर्ष 2005 में बैंकिंग कारोबार के पुनर्गठन के बाद आईडीबीआई लिमिटेड का बैंक में विलय किया गया।
समय के साथ बैंक की वित्तीय स्थिति बिगड़ती चली गई। वर्ष 2018 तक बैंक गंभीर वित्तीय संकट में पहुंच गया था। सितंबर 2018 तक इसके सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों का अनुपात 31.78 प्रतिशत तक पहुंच गया था। वित्त वर्ष 2018 में बैंक को लगभग 8,238 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था। बढ़ते डूबे कर्ज और कमजोर वित्तीय स्थिति के कारण बैंक के भविष्य को लेकर चिंताएं बढ़ गई थीं।
एलआईसी ने लगाया हजारों करोड़ का निवेश
बैंक को वित्तीय संकट से बाहर निकालने के लिए जनवरी 2019 में भारतीय जीवन बीमा निगम ने बड़ा कदम उठाया। एलआईसी ने बैंक में 51 प्रतिशत हिस्सेदारी हासिल करने के लिए लगभग 21,624 करोड़ रुपये का निवेश किया। इसके बाद एलआईसी बैंक की प्रमुख हिस्सेदार बन गई।
इस निवेश के जरिए बैंक को आर्थिक संकट से उबारने और उसकी वित्तीय स्थिति मजबूत करने का प्रयास किया गया। इस प्रक्रिया में बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण से विशेष अनुमति भी ली गई थी। इस निवेश को लेकर अब यह सवाल उठाया जा रहा है कि आम नागरिकों की बीमा पॉलिसियों से जुटाई गई राशि का उपयोग करके जिस बैंक को संकट से बाहर निकाला गया, उसके निजीकरण से पॉलिसीधारकों और सार्वजनिक हितों को कितना लाभ होगा।
घाटे से मुनाफे तक का सफर, बैंक के प्रदर्शन पर उठे सवाल
बैंक के वित्तीय प्रदर्शन में सुधार के बाद उसकी स्थिति में बड़ा बदलाव आने का दावा किया जा रहा है। प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में बैंक की कुल आय 35,744 करोड़ रुपये तक पहुंच गई। बैंक का कुल कारोबार 6 लाख करोड़ रुपये के पार चला गया, जबकि जमा राशि में 23 प्रतिशत की वृद्धि के साथ यह 3.47 लाख करोड़ रुपये बताई गई।
सितंबर 2026 में समाप्त हुई तिमाही में बैंक ने 2,226 करोड़ रुपये का मुनाफा दर्ज किया। वहीं, वित्त वर्ष 2025 में 7,515 करोड़ रुपये के मुकाबले वित्त वर्ष 2026 में वार्षिक मुनाफा 9,513 करोड़ रुपये बताया गया है।
इन आंकड़ों के आधार पर बैंक की बिक्री को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं कि जब किसी बैंक की वित्तीय स्थिति में सुधार हो रहा हो और वह लगातार मुनाफा कमा रहा हो, तब उसकी हिस्सेदारी बेचने का फैसला किस आधार पर लिया गया।
फेयरफैक्स को हिस्सेदारी बेचने के फैसले पर विवाद
रिपोर्ट में दिए गए विवरण के अनुसार, 14 अक्टूबर 2026 को केंद्र सरकार ने सरकार और एलआईसी के पास मौजूद कुल 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी कनाडा की कंपनी फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स को 52,878 करोड़ रुपये में बेचने की मंजूरी दी। इस प्रस्ताव के सामने आने के बाद सौदे की कीमत और पूरी प्रक्रिया को लेकर बहस शुरू हो गई।
आरोप है कि बोली प्रक्रिया के दौरान मूल्यांकन से जुड़े नियमों में बदलाव किया गया। बताया गया है कि फेयरफैक्स की शुरुआती बोली 75 रुपये प्रति शेयर थी। इसके बाद विनिवेश प्रक्रिया की निगरानी करने वाले सचिवों के समूह ने मूल्यांकन प्रक्रिया में बदलाव करते हुए दोबारा बोलियां आमंत्रित कीं।
इसके बाद कंपनी की ओर से 81 रुपये प्रति शेयर की नई बोली लगाए जाने की जानकारी दी गई। वहीं, सरकार की ओर से निर्धारित शुरुआती न्यूनतम मूल्य 94.42 रुपये प्रति शेयर बताया गया था। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि निर्धारित न्यूनतम मूल्य से कम बोली को स्वीकार करने का आधार क्या था और इस निर्णय के पीछे कौन से वित्तीय तथा प्रशासनिक कारण रहे।
रेलवे स्टोर्स कोड के इस्तेमाल पर भी सवाल
इस सौदे को लेकर एक अन्य विवाद नियमों की व्याख्या से जुड़ा बताया जा रहा है। आरोप है कि न्यूनतम निर्धारित मूल्य से कम बोली स्वीकार करने के निर्णय को उचित ठहराने के लिए ब्रिटिश शासनकाल के रेलवे स्टोर्स कोड का हवाला दिया गया।
इस संहिता के प्रावधानों के अनुसार, विशेष परिस्थितियों में संबंधित अधिकारी निर्धारित न्यूनतम मूल्य से कम बोली स्वीकार कर सकता है, लेकिन इसके लिए कारणों को लिखित रूप में दर्ज करना आवश्यक होता है।
अब सवाल उठाया जा रहा है कि रेलवे विभाग की खरीद प्रक्रिया से जुड़े इस प्रावधान का इस्तेमाल देश के एक बड़े बैंक की हिस्सेदारी बिक्री में किस आधार पर किया गया। क्या इस निर्णय के लिए अलग से कानूनी और वित्तीय आधार मौजूद था? क्या पूरी प्रक्रिया में सभी संभावित खरीदारों को समान अवसर दिया गया? इन सवालों पर स्पष्ट जानकारी सामने आना जरूरी माना जा रहा है।
बिक्री प्रक्रिया को लेकर पांच बड़े सवाल
आईडीबीआई बैंक की हिस्सेदारी बिक्री को लेकर कई महत्वपूर्ण सवाल सामने आ रहे हैं।
पहला सवाल यह है कि शुरुआती बोलियां और संभावित खरीदारों की सूची तैयार होने के बाद बिक्री प्रक्रिया में बदलाव करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? यदि मूल्यांकन के नियम बदले गए, तो इसका आधार क्या था?
दूसरा सवाल यह है कि नई शर्तों के तहत अन्य संभावित निवेशकों को भी दोबारा बोली लगाने का अवसर क्यों नहीं दिया गया? क्या सभी इच्छुक कंपनियों को समान अवसर उपलब्ध कराया गया था?
तीसरा सवाल दूसरे संभावित बोलीदाता की पहचान को लेकर है। यदि बिक्री प्रक्रिया में एक से अधिक कंपनियां शामिल थीं, तो दूसरे बोलीदाता का नाम सार्वजनिक नहीं किए जाने का आधार क्या है?
चौथा सवाल एलआईसी के निवेश और पॉलिसीधारकों के हितों से जुड़ा है। जब बैंक को संकट से बाहर निकालने में बीमा निगम की बड़ी पूंजी लगी थी, तो हिस्सेदारी बेचने के निर्णय में पॉलिसीधारकों के हितों का आकलन किस तरह किया गया?
पांचवां और सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि बैंक की वित्तीय स्थिति में सुधार और मुनाफे के बावजूद हिस्सेदारी बेचने का फैसला किस आर्थिक नीति के तहत लिया गया? क्या सरकार ने बैंक के भविष्य के मूल्यांकन और सार्वजनिक हितों को ध्यान में रखते हुए सभी विकल्पों पर विचार किया था?
सार्वजनिक धन और पारदर्शिता पर टिकी निगाहें
आईडीबीआई बैंक की हिस्सेदारी बिक्री का मामला केवल एक बैंक के निजीकरण तक सीमित नहीं है। इससे सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों, सरकारी निवेश और आम नागरिकों की बचत के इस्तेमाल से जुड़े व्यापक सवाल भी जुड़े हुए हैं।
आलोचकों का तर्क है कि जब कोई सरकारी संस्थान वित्तीय संकट में होता है, तब उसे बचाने के लिए सार्वजनिक धन और आम नागरिकों की बचत का सहारा लिया जाता है। लेकिन जब वही संस्थान आर्थिक रूप से मजबूत होकर मुनाफा कमाने लगता है, तब उसके निजीकरण का निर्णय लिया जाता है। ऐसे में बिक्री की प्रक्रिया, मूल्यांकन और संभावित खरीदारों के चयन में पूरी पारदर्शिता जरूरी है।
हालांकि, सौदे में अनियमितता या किसी विशेष पक्ष को अनुचित लाभ पहुंचाने के आरोपों की स्वतंत्र जांच और आधिकारिक दस्तावेजों के आधार पर ही पुष्टि की जा सकती है। फिलहाल इस पूरे मामले में सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि आईडीबीआई बैंक की हिस्सेदारी बिक्री का निर्णय किन शर्तों, मूल्यांकन और सार्वजनिक हितों के आधार पर किया गया।
अब देश की निगाहें इस सौदे से जुड़े वित्तीय दस्तावेजों, सरकारी स्पष्टीकरण और बिक्री प्रक्रिया की पारदर्शिता पर टिकी हैं।
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