₹30,213 करोड़ के IPO में से ₹27,500 करोड़ सीधे कर्ज चुकाने में इस्तेमाल होंगे: यह ‘डेवलपमेंट’ है या बैलेंस शीट साफ करने का खेल?
बड़े IPO के चक्कर में लिक्विडिटी की वजह से मार्केट में मिड-कैप और स्मॉल-कैप स्टॉक्स बह रहे हैं: यह कोई पब्लिक इश्यू है या रिटेल इन्वेस्टर्स की कीमत पर कंपनी का कर्ज कम करने की कोशिश?
अहमदाबाद : देश की बड़ी टेलीकॉम और डिजिटल कंपनी Jio Platforms का मेगा IPO इस समय चर्चा के सेंटर में है। कंपनी की वैल्यू ₹10.3 लाख करोड़ लगाई गई है और यह बिल्कुल फ्रेश इश्यू (27 करोड़ शेयर) है, जिसमें कोई ऑफर-फॉर-सेल नहीं है। लेकिन, इन चमकदार आंकड़ों के पीछे छिपा असली इकोनॉमिक गणित जनता के होश उड़ाने के लिए काफी है। इन्वेस्ट करने से पहले यह कड़वा सच जानना ज़रूरी है। पैसा कहां जाएगा? डेवलपमेंट में या पुराने कर्ज़ चुकाने में?
ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (DRHP) डॉक्यूमेंट्स में साफ लिखा है कि इस IPO से जमा हुई बड़ी रकम में से ₹27,500 करोड़ सीधे सब्सिडियरी रिलायंस जियो इंफोकॉम के कर्ज़ों के प्रीपेमेंट या रीपेमेंट में डूब जाएंगे!
कंपनी के पास नए डिजिटल एक्सपेंशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) या 6G टेक्नोलॉजी में इन्वेस्ट करने के लिए सिर्फ ₹2,700 करोड़ बचेंगे।
सवाल सीधा और जानलेवा है: एक ऐसा IPO जिसमें 91% फंड सिर्फ पुराने कर्ज़ चुकाने में इस्तेमाल होने हैं, उसे “ग्रोथ IPO” या “डेवलपमेंट का तोहफा” कैसे कहा जा सकता है? अगर यह कर्ज़ का बोझ सीधे आम जनता और इन्वेस्टर्स के कंधों पर डालने की चाल नहीं है, तो और क्या है?
पहाड़ जैसा कर्ज़ और प्रॉफिटेबिलिटी की तस्वीर
31 मार्च, 2026 तक के आंकड़ों के मुताबिक, जियो प्लेटफॉर्म्स का कुल कर्ज़ करीब ₹70,781 करोड़ है। लेकिन, कंपनी ने FY26 में ₹1,46,885 करोड़ का बड़ा रेवेन्यू और ₹30,049 करोड़ का नेट प्रॉफ़िट दिखाया है (51.9% के मज़बूत EBITDA मार्जिन के साथ) और इसके पास ₹52.44 करोड़ का बड़ा कस्टमर बेस भी है।
लेकिन सच तो यह है कि कंपनी के प्रॉफ़िट में होने के बावजूद, कर्ज़ पहाड़ जितना ऊँचा है। ₹27,500 करोड़ चुकाने के बाद भी, कंपनी पर ₹43,000 करोड़ से ज़्यादा का कर्ज़ होगा! तो सवाल यह है कि क्या यह एक IPO काफ़ी होगा, या भविष्य में इस बचे हुए कर्ज़ को चुकाने के लिए उसे फिर से ऐसे ही फंड जुटाने होंगे?
इन्वेस्टर्स के लिए बड़ा सवाल: क्या स्टॉक बढ़ेगा या फंस जाएगा?
यहीं पर इन्वेस्टर्स को अलर्ट रहना होगा और सोचना होगा:
- यह सच है कि इंटरेस्ट कम होगा: ₹27,500 करोड़ के कर्ज़ में कमी से इंटरेस्ट का खर्च कम होगा और प्रॉफ़िट में काफ़ी बढ़ोतरी होगी, जो लंबे समय में पॉज़िटिव है।
- ग्रोथ स्टोरी कहाँ गई?: IPO का पैसा नए टावर, 5G रोलआउट या AI में नहीं जा रहा है, बल्कि इसका इस्तेमाल पिछले कर्ज़ चुकाने में हो रहा है। स्टॉक मार्केट हमेशा भविष्य की ग्रोथ को महत्व देता है, पिछले कर्ज़ों को नहीं!
- बहुत ज़्यादा वैल्यूएशन: ₹10.3 लाख करोड़ के वैल्यूएशन का मतलब है कि कंपनी के भविष्य की सभी अच्छी चीज़ें पहले से ही कीमत में शामिल हैं। अगर इसे लिस्टिंग गेन मिलता है, तो अच्छी बात है, लेकिन लंबे समय में स्टॉक को अपनी कीमत साबित करने के लिए अपना ARPU (रेवेन्यू पर यूज़र) बहुत ज़्यादा बढ़ाना होगा। संक्षेप में, यह कोई सस्ता सौदा नहीं है; आप भारत की सबसे महंगी टेलीकॉम स्टोरी खरीद रहे हैं!
मार्केट बर्बाद: लिक्विडिटी की कमी के कारण मिड-स्मॉल कैप खत्म हो गया
इस पूरी प्रक्रिया में सबसे बड़ा झटका आम इन्वेस्टर को लगा है। सिर्फ़ ₹30,213 करोड़ के इस अकेले IPO के लिए लगभग ₹2 लाख करोड़ का एक बड़ा फंड मार्केट से निकाल लिया गया! नतीजा क्या रहा? पिछले 3 दिनों में लोगों ने IPO के लिए अप्लाई करने की हड़बड़ी में अपने फ़ायदेमंद मिड-कैप और स्मॉल-कैप स्टॉक पानी के भाव बेच दिए, जिससे पूरे स्टॉक मार्केट में अफ़रा-तफ़री मच गई और स्मॉल-कैप इन्वेस्टर बर्बाद हो गए।
इस सिस्टम की सबसे बड़ी कमी यह है:
जब इतना बड़ा IPO आता है, तो मार्केट की पूरी लिक्विडिटी एक जगह खिंच जाती है।
रिटेल इन्वेस्टर ज़बरदस्ती आकर अपना सांगोपांग पोर्टफोलियो खत्म कर देते हैं।
आखिर में नतीजा यह होता है कि IPO चलता भी नहीं और दूसरी तरफ़ पोर्टफोलियो भी टूट जाता है!
क्या SEBI और स्टॉक एक्सचेंज के पास इस “IPO फंडिंग के लिए शेयरों की अंधाधुंध बिक्री” को रोकने के लिए एक अलग लिक्विडिटी मैनेजमेंट सिस्टम नहीं होना चाहिए?
आखिरी सवाल: यह देश बनाना है या बैलेंस शीट बनाना?
यह पूरी ईमानदारी से मानना होगा कि Jio ने भारत को डिजिटल क्रांति दी और हर घर तक सस्ता डेटा पहुंचाया। लेकिन आज का सवाल बिज़नेस और एथिक्स के बारे में है:
क्या यह “राष्ट्र निर्माण” है या सिर्फ़ “कॉर्पोरेट बैलेंस शीट निर्माण” है कि कोई कंपनी आम जनता और इन्वेस्टर्स से ₹30,000 करोड़ निकालकर अपनी बैलेंस शीट को साफ़ करे?
बिना सोचे-समझे भीड़ के पीछे भागना और पोर्टफोलियो को खाली करना इन्वेस्टमेंट नहीं है, यह एक फाइनेंशियल जुआ है। अखबार पढ़ें, कर्ज़ और वैल्यूएशन का गणित समझें, और उसके बाद ही कोई फ़ैसला लें!

