कोई भी पार्टी सत्ता की भूखी नहीं है, न ही लोगों के विकास की: वोट के अधिकार के प्रति वफ़ादार रहकर लोकतंत्र को बचाने की ज़िम्मेदारी अब हमारी है!
अहमदाबाद/गांधीनगर : रोज़ सुबह उठते ही टीवी स्क्रीन से लेकर सोशल मीडिया तक, नेताओं की बहसें, एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने वाले बयान और झूठ की बौछारें देखी जा सकती हैं। इस देश के नेताओं ने धर्म, जाति और राजनीतिक भावनाओं के मामले में लोगों को इमोशनली बेवकूफ बनाकर अपने मतलब की रोटी सेंकने का धंधा शुरू कर दिया है। लेकिन, क्या हमने कभी सोचा है कि इन सब हंगामे और राजनीतिक ड्रामे के पीछे असली शिकार कौन है? असली शिकार तो आम लोगों के संवैधानिक अधिकार हैं! आज ‘महानगर मेट्रो न्यूज़ पेपर’ के इस खास आर्टिकल में हमें यह समझना होगा कि नेताओं के इन ड्रामों से कहीं ज़्यादा ज़रूरी है हमारे वोट का सही इस्तेमाल।
चाहे BJP हो या विपक्ष, किसी को लोगों के अधिकारों की परवाह नहीं है!
आज की कड़वी सच्चाई यह है कि चाहे रूलिंग पार्टी हो या अपोज़िशन पार्टी, किसी को भी आम आदमी के असली मुद्दों जैसे महंगाई, बेरोज़गारी, एजुकेशन या हेल्थ से कोई लेना-देना नहीं है। उन्हें तो बस चुनाव जीतकर सत्ता की कुर्सी हथियाने में दिलचस्पी है। चुनाव आते ही बड़े-बड़े वादों की बारिश हो जाती है और चुनाव खत्म होते ही जनता फिर से भगवान भरोसे हो जाती है! नेता जनता की भावनाओं को कैसे मैनेज करना है, यह अच्छी तरह जानते हैं। यही वजह है कि डेवलपमेंट के मुद्दों पर बात करने के बजाय, वे फालतू के विवाद खड़े करके जनता का ध्यान भटकाते हैं।
आपका ‘वोट’ कोई भीख या मोलभाव का ज़रिया नहीं है, यह तो ब्रह्मास्त्र है!
संविधान ने हमें जो सबसे बड़ी ताकत दी है, वह है ‘वोटिंग राइट’। आपका एक वोट अगले पांच साल के लिए राज्य या देश का भविष्य तय करता है। लेकिन दुख की बात यह है कि कई बार हम जाति, धर्म, पार्टी या किसी लालच में आकर अपना कीमती वोट बेच देते हैं या गलत हाथों में सौंप देते हैं। जब आप बिना क्वालिफिकेशन के वोट देते हैं, तो आप अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारते हैं।
वोट का सही और पावरफुल इस्तेमाल कैसे करें? (अपनी ताकत पहचानें)
भविष्य में जब भी चुनाव आएं, तो नागरिक होने के नाते हमें इन सख्त नियमों का पालन करना होगा:
व्यक्ति और काम के लिए वोट दें, पार्टी के लिए नहीं: उम्मीदवार कितना काबिल है, जनता के साथ कितना ईमानदार है और उसका अतीत क्या है, यह देखने के बाद ही बटन दबाएं।
सवाल पूछने की हिम्मत रखें: नेताओं से उनके पांच साल के काम का हिसाब मांगें। चुनाव में अपने वादे पूरे न करने वाले नेताओं से सबके सामने सवाल करें।
इमोशनल लालच से बचें: धर्म या जाति के आधार पर इमोशनल होकर वोट देने के बजाय, अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य और रोज़गार को ध्यान में रखकर वोट दें।
मतदान के दिन घर से बाहर निकलें: जो लोग वोट देने नहीं जाते, उन्हें सरकार की आलोचना करने का कोई अधिकार नहीं है। सौ प्रतिशत वोटिंग ही लोकतंत्र की सच्ची रक्षा है।
याद रखें, नेता बदलने से सिस्टम नहीं बदलता, लेकिन जब लोग अपनी ताकत पहचानते हैं और सही और सटीक वोट का इस्तेमाल करते हैं, तो बड़े-बड़े सिंहासन हिल जाते हैं। अब इमोशनल पॉलिटिक्स का पूरी तरह से बायकॉट करके अपने अधिकारों की रक्षा करने का समय है!

