देश की अर्थव्यवस्था को लेकर किए जा रहे गुलाबी दावों के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन के एक तीखे बयान ने नीति-निर्माताओं और हुक्मरानों की नींद उड़ा दी है। रघुराम राजन ने देश के आर्थिक परिदृश्य पर गंभीर सवाल उठाते हुए पूछा है कि “अगर ‘अर्थव्यवस्था’ इतनी ही तेजी से बढ़ रही है, तो बाजार में अच्छी ‘नौकरियां’ क्यों नहीं पैदा हो रही हैं? देश में नया निवेश क्यों नहीं आ रहा है? और देश के बड़े उद्योगपति नया पूंजी निवेश (Capital Investment) करने से झिझक क्यों रहे हैं?”
यह महज एक बयान नहीं, बल्कि उन करोड़ों युवाओं और मध्यम वर्गीय परिवारों का दर्द है जो हर दिन डिग्री हाथ में लिए रोजगार के लिए दर-दर भटक रहे हैं।
कागजी विकास बनाम जमीनी हकीकत: चमकते आंकड़ों के पीछे छुपा बेरोजगारी का अंधेरा
सरकार भले ही जीडीपी (GDP) के आंकड़ों को उछालकर अपनी पीठ थपथपा ले, लेकिन रघुराम राजन का यह सवाल सीधे उस कड़वी हकीकत पर प्रहार करता है जिसे देश का आम नागरिक हर दिन महसूस कर रहा है।
बेरोजगार युवा: उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद भी युवाओं को उनकी योग्यता के अनुसार सम्मानजनक और सुरक्षित नौकरियां नहीं मिल रही हैं।
उद्योगपतियों का डर: यदि देश में खपत और मांग बढ़ रही है, तो उद्योगपति नई फैक्ट्रियां लगाने और विस्तार करने से क्यों कतरा रहे हैं? निजी निवेश (Private Investment) की यह सुस्ती साफ संकेत देती है कि उद्योग जगत को भविष्य की मांग पर भरोसा नहीं है।
बिना नौकरियों की ग्रोथ (Jobless Growth): भारत एक ऐसे खतरनाक मोड़ पर खड़ा है जहां आर्थिक वृद्धि तो दिख रही है, लेकिन वह नौकरियां पैदा करने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रही है।
सरकार से सीधा सवाल: आंकड़े नहीं, आम जनता को जवाब चाहिए!
रघुराम राजन के इन चुभते सवालों ने केंद्र सरकार और वित्त मंत्रालय को कठघरे में खड़ा कर दिया है। सरकार को अब विज्ञापनों और हेडलाइंस से बाहर निकलकर इन बुनियादी सवालों के जवाब देने होंगे:
आखिर निजी क्षेत्र (Private Sector) में नया निवेश क्यों अटका हुआ है?
देश का कॉरपोरेट जगत अपनी तिजोरियां भरकर तो बैठा है, लेकिन नए रोजगार पैदा करने के लिए जमीनी स्तर पर पैसा क्यों नहीं लगा रहा?
क्या केवल गिने-चुने उद्योगपतियों की संपत्ति बढ़ना ही देश की असली तरक्की है, या देश के आम नागरिक की क्रय शक्ति (Purchasing Power) और रोजगार बढ़ना असली विकास है?
यदि समय रहते इस ‘जॉबलेस ग्रोथ’ के चक्रव्यूह को नहीं तोड़ा गया, तो भारत का जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) देश के लिए एक बड़ा सामाजिक और आर्थिक संकट बन सकता है।

