एशिया के सबसे बड़े सरकारी अस्पतालों में से एक अहमदाबाद का असरवा सिविल हॉस्पिटल एक बार फिर विवादों में घिर गया है। मरीजों के इलाज और सुविधाओं के लिए मशहूर इस हॉस्पिटल में अब कर्मचारियों की ट्रांसफर पॉलिसी को लेकर बहुत गंभीर सवाल उठ रहे हैं। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, इस बात की चर्चा जोर पकड़ रही है कि हॉस्पिटल सिस्टम में अधिकारियों से ज्यादा सुपरवाइजरों की मनमानी चलती है।
ट्रॉमा सेंटर से 1200 बेड: रातों-रात 16 फोर्थ क्लास कर्मचारियों का ट्रांसफर
मिली जानकारी के मुताबिक, असरवा सिविल के ट्रॉमा सेंटर में दोपहर 2 बजे से रात 10 बजे की शिफ्ट में काम करने वाले करीब 16 फोर्थ क्लास कर्मचारियों का तुरंत 1200 बेड वाले हॉस्पिटल में ट्रांसफर कर दिया गया है। हैरानी की बात यह है कि दूसरी तरफ, 1200 बेड वाले हॉस्पिटल में काम करने वाले 16 कर्मचारियों को ट्रॉमा सेंटर भेज दिया गया है। एक साथ इतनी बड़ी संख्या में कर्मचारियों के बड़े पैमाने पर ट्रांसफर से अस्पताल के अंदरूनी हलकों में कई बहसें और वाद-विवाद शुरू हो गए हैं।
सुपरवाइजर का राज या प्रशासनिक मनमानी? कई तीखे सवाल उठे हैं
किसी भी बड़े प्रशासनिक बदलाव के पीछे कोई खास वजह होती है, लेकिन यह साफ नहीं है कि असरवा सिविल में इस बड़े पैमाने पर ट्रांसफर के पीछे कौन सा बड़ा गणित काम कर रहा है।
क्या यह ट्रांसफर सिर्फ सुपरवाइजर के निजी कहने पर और निजी रंजिश के चलते किया गया है?
2 से 10 की अहम शिफ्ट में काम करने वाले अनुभवी कर्मचारियों के बड़े पैमाने पर ट्रांसफर के पीछे असली वजह क्या है?
क्या इस ट्रांसफर से ट्रॉमा सेंटर और 1200 बेड वाले अस्पताल में आने वाले इमरजेंसी मरीजों के इलाज पर असर नहीं पड़ेगा?
क्या यह खेल बड़े अधिकारियों की जानकारी के बिना खेला जा रहा है या अधिकारी भी चुपचाप तमाशा देख रहे हैं?
मरीज़ों के इलाज में रुकावट का डर ट्रॉमा सेंटर सिविल अस्पताल का सबसे सेंसिटिव और इमरजेंसी डिपार्टमेंट माना जाता है, जहां किसी भी पल मरीज़ों की जान दांव पर लगी रहती है। इतने ज़रूरी डिपार्टमेंट से एक साथ 16 क्लास-4 कर्मचारियों का ट्रांसफर होने से इमरजेंसी सर्विस में रुकावट आने का डर है। अगर यह फ़ैसला सिर्फ़ सुपरवाइज़र की दादागिरी या मनमानी का नतीजा है, तो यह ज़रूरी हो गया है कि बड़े अधिकारी इस मामले में तुरंत दखल दें और कुछ बदलाव करें।

