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गांधीनगर के सरकारी गलियारों और IKDRC में बड़ा धमाका: क्या डायलिसिस प्रोग्राम को बंद करने का षड्यंत्र? मरीजों और तकनीशियनों का शोषण करते सत्ताधीश!

‘महानगर मेट्रो’ ग्राउंड रिपोर्ट — स्वास्थ्य क्षेत्र में ‘आउटसोर्सिंग’ और अहंकार का बोलबाला, सरकार को करोड़ों का नुकसान!

गुजरात सरकार द्वारा गरीब मरीजों को घर के पास मुफ्त डायलिसिस की सुविधा मुहैया कराने के लिए “गुजरात डायलिसिस प्रोग्राम” (GDP) शुरू किया गया था। यह योजना लाखों मरीजों के लिए संजीवनी साबित हुई। लेकिन IKDRC (इंस्टीट्यूट ऑफ किडनी डिजीज एंड रिसर्च सेंटर) के प्रमुख डॉ. प्रांजल मोदी और उनकी टीम की विवादित नीतियों के कारण आज यह पूरा कार्यक्रम ठप्प होने के कगार पर पहुंच गया है।

जिस संस्था का काम मरीजों को नवजीवन देना है, वहीं अहंकार, प्रशासनिक मनमानी और आउटसोर्सिंग के नाम पर करोड़ों रुपये के निजीकरण का खेल खेले जाने के गंभीर आरोप लग रहे हैं।

डॉ. प्रांजल मोदी की विवादित विचारधारा: मरीज आखिर कहां जाएं?

IKDRC के शीर्ष अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, डॉ. प्रांजल मोदी का मानना है कि आसानी से डायलिसिस मिलने के कारण मरीज किडनी ट्रांसप्लांट (Transplant) कराने के बारे में नहीं सोचते, जिससे ट्रांसप्लांट प्रोग्राम कमजोर पड़ रहा है। इतना ही नहीं, “डायलिसिस कराने वाला मरीज २-३ साल में तकलीफें सहकर मर ही जाता है” — ऐसी नकारात्मक सोच के साथ पूरे विभाग और प्रोग्राम को कमजोर करने का प्रयास किया जा रहा है। यूरोलॉजिस्ट होने के नाते नेफ्रोलॉजी विभाग और डायलिसिस सेक्शन को दबाकर रखने की इस मानसिकता से मरीजों का भविष्य अधर में लटक गया है।

घातक मनमानी और आउटसोर्सिंग का खेल: सरकार पर २४% का अतिरिक्त आर्थिक बोझ!
डायलिसिस प्रोग्राम के सुचारू संचालन को ध्वस्त करने के लिए एक के बाद एक चौंकाने वाले फैसले लिए गए हैं:
सीनियर तकनीशियनों का शोषण: पिछले १०-१० सालों से सेवाएं दे रहे, अनुभवी और २४ घंटे तकनीकी समस्याओं का समाधान करने वाले सीनियर तकनीशियनों को विवादों में फंसाकर निकाल दिया गया है। नए आउटसोर्सिंग टेंडर के नाम पर अनुभवी कर्मचारियों के वेतन में भारी कटौती की गई है।

सरकारी धन की बर्बादी: आउटसोर्सिंग के नाम पर सरकार पर २४% अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाला गया है। जो दवाएं और सामग्री (Consumables) पहले IKDRC द्वारा समय पर पहुंचाई जाती थीं, उसकी जिम्मेदारी GMSCL को दे दी गई है, जिससे अब गंभीर अनियमितता पैदा हो गई है।

मुफ्त मिलने वाली मशीनें अब सरकारी खर्च पर खरीदी जाएंगी: ‘Fairfax India Charitable Foundation’ जैसी संस्था ने अब तक २०० से अधिक डायलिसिस मशीनें मुफ्त में दी थीं। लेकिन इस फाउंडेशन से संपर्क ही बंद कर दिया गया है और अब अधिकारी सरकारी खजाने से करोड़ों की नई मशीनें खरीदकर निजी लाभ कमाने की फिराक में हैं।

रखरखाव (AMC) के नाम पर कमाई: पहले GDP के इन-हाउस कर्मचारी खुद ही R.O. Plant और डायलिसिस मशीनों की मरम्मत करके सरकार के करोड़ों रुपये बचाते थे। अब इस मेंटेनेंस का ठेका भी आउटसोर्स करके पैसे कमाने का खेल रचा जा रहा है।

मरीजों की सुरक्षा के साथ खिलवाड़

प्रशासनिक लापरवाही के साथ-साथ मरीजों के स्वास्थ्य और जीवन के साथ भी बड़ा समझौता किया जा रहा है:

संक्रमण की रोकथाम (Disinfection) बंद: पहले RO प्लांट से मशीन तक जाने वाली पाइपों की नियमित सफाई की जाती थी ताकि मरीजों को कोई बैक्टीरिया या इंफेक्शन न लगे। हेड ऑफिस द्वारा होने वाली यह निगरानी अब बंद कर दी गई है, जो मरीजों की जान के लिए सीधा खतरा है।
क्वालिटी प्रोग्राम रद्द: मरीज की ब्लड रिपोर्ट के आधार पर दवाओं की जरूरत, खून के इंजेक्शन या डायलाइजर तय करने वाला ‘Quality Improvement

Program’ पूरी तरह बंद कर दिया गया है।

टेलीमेडिसिन और जागरूकता बंद: करोड़ों के खर्च से शुरू किया गया टेलीमेडिसिन नेटवर्क, जिसके जरिए हफ्ते में ३ बार विशेषज्ञों द्वारा ऑनलाइन परामर्श दिया जाता था, अधिकारियों के अहंकार की वजह से बंद कर दिया गया है।

गैर-अनुभवी अधिकारियों की तानाशाही और धमकियां

इस पूरे प्रोग्राम की जिम्मेदारी डॉ. वीरेन त्रिवेदी और नरेश पटेल जैसे अधिकारियों को सौंपी गई है, जिन्हें डायलिसिस का कोई तकनीकी अनुभव नहीं है।
यदि कोई तकनीशियन मरीज की समस्या को लेकर बात करता है, तो नरेश पटेल द्वारा बदसलूकी करते हुए “अधीक्षक को सूचना दो या सेंटर बंद कर दो / प्राइवेट में भेज दो” जैसे जवाब दिए जाते हैं। वहीं डॉ. वीरेन त्रिवेदी कर्मचारियों को “दूसरी नौकरी ढूंढ लो, मुझे यह प्रोग्राम ही बंद कर देना है” जैसी धमकियां देते हैं। आवाज उठाने वाले कर्मचारियों का दूर-दराज के जिलों में तबादला कर दिया जाता है।

‘महानगर मेट्रो’ का सरकार से सीधा सवाल:

क्या गांधीनगर में बैठे स्वास्थ्य मंत्री और उच्च अधिकारी इस पूरे घटनाक्रम से अनजान हैं? जिस योजना से गुजरात के हजारों गरीब मरीजों की सांसें चल रही थीं, उसे आउटसोर्सिंग और व्यक्तिगत अहंकार की बलि चढ़ाने के लिए कौन जिम्मेदार है?

यदि इस मनमानी पर तुरंत रोक नहीं लगाई गई और अनुभवी कर्मचारियों को न्याय नहीं मिला, तो ‘महानगर मेट्रो’ इस आवाज को मजबूती से जनता और विधानसभा तक पहुंचाता रहेगा!

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