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दिल्ली के जंतर-मंतर पर ‘रिज़र्वेशन हटाओ आंदोलन’: BJP के लिए यह एक बड़ी पॉलिटिकल पहेली क्यों बन गया है?

नई दिल्ली / अहमदाबाद: दिल्ली के जंतर-मंतर पर सोशल मीडिया पर शुरू हुए ‘रिज़र्वेशन हटाओ आंदोलन’ और रिज़र्वेशन सुधारों की मांग को लेकर हो रहे विरोध प्रदर्शनों ने देश की पॉलिटिक्स को गरमा दिया है। युवा आंदोलनकारी जाति-आधारित रिज़र्वेशन सिस्टम को खत्म करने और ‘एक परिवार, एक रिज़र्वेशन’ जैसी पॉलिसी लागू करने की मांग कर रहे हैं।

इन आंदोलनों और विरोध प्रदर्शनों ने केंद्र में सत्ताधारी BJP के लिए बहुत ही मुश्किल और नाजुक पॉलिटिकल हालात पैदा कर दिए हैं।

  1. पारंपरिक अपर कास्ट वोट बैंक के नाराज़ होने का डर

BJP का पारंपरिक और मज़बूत बेस अपर कास्ट (जनरल कैटेगरी) कम्युनिटी रहा है। जंतर-मंतर पर जमा हुए युवाओं और स्टूडेंट्स का गुस्सा मुख्य रूप से सरकारी नौकरियों, एंट्रेंस एग्जाम और UGC पॉलिसी के खिलाफ है। अगर BJP इन युवाओं का गुस्सा शांत करने में नाकाम रहती है या उनकी मांगों को सीधे तौर पर खारिज कर देती है, तो उसे अपने कोर अपर कास्ट वोट बैंक में बड़ा झटका लग सकता है।

  1. OBC, SC और ST समुदायों के अलग-थलग पड़ने का बड़ा खतरा

दूसरी तरफ, BJP ने पिछले एक दशक में OBC, SC और ST समुदायों को अपने पाले में करने के लिए राजनीतिक रूप से कड़ी मेहनत की है। अगर BJP आंदोलनकारियों की आर्थिक आधार पर आरक्षण या जाति आधारित आरक्षण खत्म करने की मांग के खिलाफ थोड़ा भी नरम रुख दिखाती है, तो विपक्षी दल इसे “आरक्षण विरोधी” कहकर SC, ST और OBC वर्गों में BJP के खिलाफ बगावत कर सकते हैं।

  1. सहयोगी दलों का सख्त रुख

NDA सरकार में दलित और पिछड़े वर्ग के नेता और गठबंधन सहयोगी जाति आधारित आरक्षण के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ बर्दाश्त करने को तैयार नहीं हैं। सरकार के लिए अपने गठबंधन सहयोगियों को बचाना और साथ ही ऊंची जाति के युवाओं का गुस्सा शांत करना तलवार की धार पर चलने जैसा हो गया है।

  1. जेपी नड्डा का दौरा और सरकार की दुविधा

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के बाद, BJP के राष्ट्रीय अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा ने दिल्ली में आंदोलन के प्रतिनिधियों के साथ मीटिंग की। इस मीटिंग से पता चलता है कि BJP इस आंदोलन को हल्के में लेने की गलती नहीं करना चाहती। हालांकि, BJP के लिए सबसे बड़ी दुविधा यह है कि अगर वे मांगें मान लेते हैं, तो पिछड़े वर्ग के लोग नाराज़ हो जाते हैं, और अगर वे इसे मना करते हैं, तो उन्हें ऊंची जाति के युवाओं का गुस्सा झेलना पड़ता है।

  1. सोशल मीडिया और Gen-Z युवाओं का गुस्सा

यह आंदोलन किसी पारंपरिक राजनीतिक पार्टी ने नहीं, बल्कि इंस्टाग्राम और डिजिटल प्लेटफॉर्म से चलने वाले युवाओं ने खड़ा किया है। ऐसे गैर-राजनीतिक युवा आंदोलनों को दबाना या कंट्रोल करना हमेशा राजनीतिक पार्टियों के लिए सबसे मुश्किल साबित होता है।

महानगर मेट्रो न्यूज़ एनालिसिस:

भारतीय राजनीति में आरक्षण का मुद्दा हमेशा से बहुत संवेदनशील रहा है। एक तरफ देश के सवर्ण युवा अपनी नौकरी और भविष्य के लिए रिज़र्वेशन पॉलिसी में बड़े सुधार की मांग कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ सोशल जस्टिस के नाम पर रिज़र्वेशन बचाने का मुद्दा देश की ज़्यादातर आबादी से जुड़ा हुआ है। अब देखना यह है कि BJP इस “कुआं या खाई” वाली स्थिति से निकलने के लिए क्या बीच का रास्ता निकालती है।

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