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क्या फास्ट ट्रैक कोर्ट सच में ‘फास्ट’ है या सिर्फ नाम का? NEET पेपर लीक केस में पहले दिन सुनवाई टलने से जस्टिस सिस्टम पर गंभीर सवाल उठे

नई दिल्ली/अहमदाबाद : देश के लाखों स्टूडेंट्स और पेरेंट्स के भविष्य से जुड़े विवादित NEET पेपर लीक केस में इंसाफ की उम्मीद लगाए बैठे देशवासियों को पहले ही दिन बड़ा झटका लगा है। पेपर लीक जैसे गंभीर और सेंसिटिव केस को जल्दी निपटाने के मकसद से स्पेशल ‘फास्ट ट्रैक कोर्ट’ बनाया गया था। लेकिन बदकिस्मती से, जिस कोर्ट से ‘सुपरफास्ट’ इंसाफ की उम्मीद थी, उसे पहले ही दिन सुनवाई टालनी पड़ी!

CBI की तरफ से कोई वकील मौजूद न होने की वजह से कोर्ट को यह सुनवाई 3 अगस्त तक टालनी पड़ी। इस घटना ने एक बार फिर देश के फास्ट ट्रैक सिस्टम और सरकारी जांच एजेंसियों की गंभीरता पर बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है।

हजारों करोड़ का धुआं, फिर भी तारीख पर तारीख!

एक तरफ सरकार देश में गंभीर अपराधों और संवेदनशील मामलों के जल्द निपटारे के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने के बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं दूसरी तरफ हकीकत इससे बिल्कुल उलट है।

बड़ा बजट धुंआ: सरकारी खजाने से देश भर में फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने और उनके ऑपरेशन के लिए हजारों करोड़ रुपये दिए गए हैं।

पेंडिंग मामलों का पहाड़: अरबों रुपये खर्च करने के बाद भी लाखों मामले देश के इन फास्ट ट्रैक कोर्ट में धूल फांक रहे हैं।

जांच एजेंसियों की लापरवाही: NEET जैसे देशव्यापी घोटाले में CBI जैसे बड़े सिस्टम के किसी वकील का पहली सुनवाई में मौजूद न होना सिस्टम की बड़ी लापरवाही दिखाता है।

जनता का सवाल: क्या यह ‘फास्ट’ सिस्टम सिर्फ कागजों पर है?

जब देश का युवा पेपर लीक जैसे मामलों में न्याय की भीख मांगते हुए सड़कों पर उतर रहा है, तो फास्ट ट्रैक कोर्ट की ऐसी ढीली नीतियां और नियम जनता का गुस्सा दोगुना कर रहे हैं। लोग अब खुलकर सवाल पूछ रहे हैं:

  1. अगर पहले ही दिन तारीख देनी हो, तो उसे ‘फास्ट ट्रैक’ कहते हैं या ‘स्लो ट्रैक’?
  2. अगर जनता के टैक्स के हज़ारों करोड़ रुपये बर्बाद होने के बाद भी हमें न्याय के लिए सालों इंतज़ार करना पड़े, तो इसके लिए कौन ज़िम्मेदार है?
  3. जिस मामले से लाखों स्टूडेंट्स का भविष्य जुड़ा हो, उसमें जांच एजेंसियां ​​इतनी गैर-ज़िम्मेदार कैसे हो सकती हैं?

न्याय में देरी न्याय का अपमान है!

NEET पेपर लीक मामले की पहली सुनवाई का टलना यह साबित करता है कि सिर्फ़ ‘फास्ट ट्रैक’ नाम देने से सिस्टम तेज़ नहीं होता। जब तक कानूनी प्रक्रिया से अंदरूनी ढिलाई, वकीलों की गैर-मौजूदगी और तारीख पर तारीख देने की सोच दूर नहीं होती, तब तक ‘फास्ट जस्टिस’ आम नागरिक के लिए सिर्फ़ एक सपना ही रहेगा।

अब पूरे देश की नज़रें आने वाली 3 अगस्त पर टिकी हैं। अब देखना यह है कि CBI और फास्ट ट्रैक कोर्ट आने वाली सुनवाई में वाकई अच्छा काम करते हैं या फिर एक बार फिर तारीख देकर लाखों स्टूडेंट्स की उम्मीदों पर पानी फेर दिया जाता है!

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