अहमदाबाद। स्मार्ट सिटी के नाम पर बड़ी-बड़ी बातें, कागजों पर हजारों करोड़ के वादे और दावे! लेकिन कुछ घंटों की बारिश ने अहमदाबाद म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के भ्रष्टाचार की पोल खोल दी है और उसे सड़कों पर ला खड़ा किया है। पॉश इलाकों में करोड़ों रुपये के बंगलों में सीवेज और बारिश का पानी घुस गया है। नागरिक पूछ रहे हैं कि 18,500 करोड़ रुपये के सालाना बजट वाला शहर इतनी जल्दी झील में कैसे बदल गया?
जनता के टैक्स के पैसे का हिसाब कौन देगा?
अहमदाबाद के लोग हर साल ईमानदारी से करोड़ों रुपये का टैक्स देते हैं। लेकिन बदले में उन्हें क्या मिलता है?
गड्ढे और जर्जर सड़कें: करोड़ों की लागत से बनी सड़कें बारिश में बह गईं।
कमजोर पुल और भ्रष्टाचार: कभी करोड़ों रुपये की लागत से बने पुलों में दरारें आ जाती हैं, तो कभी वे ढह जाते हैं।
सड़कों और सीवर की खराब हालत: नेटवर्क और ड्रेनेज सिस्टम जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण पूरा शहर पानी में डूबा हुआ है।
सवाल यह है कि 18,500 करोड़ रुपये का भारी-भरकम बजट आखिर कहां इस्तेमाल हो रहा है? क्या लोगों की मेहनत की कमाई का इस्तेमाल पानी की निकासी के लिए नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार के गहरे गड्ढों को भरने के लिए किया जा रहा है?
40% कमीशन राज का आरोप और अधिकारियों का घमंड
AMC में सालों से एकतरफा सत्ता का आनंद ले रहे शासकों और अधिकारियों के खिलाफ जनता का गुस्सा अब चरम पर है। स्थानीय लोग खुलेआम आरोप लगा रहे हैं कि विकास कार्यों के टेंडर में भारी कमीशन का खेल चल रहा है।
चुनाव के दौरान सेवा का वादा करने वाले कॉरपोरेटर और अधिकारी आज करोड़ों की संपत्ति के मालिक बन गए हैं। जब पूरा शहर पानी में डूबा हुआ है और आम नागरिक परेशान हो रहे हैं, तो लोग आरोप लगा रहे हैं कि मेयर और म्युनिसिपल कमिश्नर, बड़े अधिकारियों के साथ, बस AC ऑफिस में बैठकर मीटिंगों का दौर चला रहे हैं।
सिस्टम के खिलाफ जनता के तीखे सवाल
- करोड़ों के टेंडर पास होने के बाद भी सड़कों और सीवर लाइनों की गुणवत्ता में सुधार क्यों नहीं हो रहा है?
- ठेकेदारों और अधिकारियों की मिलीभगत के खिलाफ़ सख़्त कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे हैं?
- मॉनसून के दौरान हर साल जनता को जो परेशानी झेलनी पड़ती है, उसके लिए कौन ज़िम्मेदार है?
अब AMC के शासकों और अधिकारियों के लिए अपनी कुंभकर्णीय नींद से जागने का समय आ गया है। अगर जनता के टैक्स के पैसे का सही इस्तेमाल करके शहर की स्थिति में सुधार नहीं किया गया, तो आने वाले दिनों में अधिकारियों को जनता के इस गुस्से का भारी खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।

