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स्कैम या एजुकेशन की नई तस्वीर? 10 साल में 94,000 सरकारी स्कूल बंद होने के पीछे का असली सच!

गांधीनगर : 2014 से पहले का भारत और 2014 के बाद का भारत। इन दोनों समय के एजुकेशन सिस्टम को लेकर अब सोशल मीडिया पर ज़बरदस्त जंग छिड़ गई है। एक तरफ़ दावा किया जा रहा है कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में ‘राइट टू एजुकेशन’ (RTE) के तहत देश में सरकारी स्कूलों की नींव मज़बूत हुई, तो दूसरी तरफ़ आरोप लगाया जा रहा है कि पिछले 10 सालों में देश भर में हज़ारों सरकारी स्कूल बंद हो गए हैं। इन आंकड़ों के भ्रम के पीछे असली सच क्या है? स्कैम किसने किया और असलियत क्या है? आइए फैक्ट्स के साथ पता करते हैं।

आइए एक नज़र डालते हैं कि इस समय एजुकेशन की दुनिया में किस बात पर गुस्सा और चर्चा हो रही है।

2014 से पहले के हालात और 11 लाख स्कूलों का गणित

सोशल मीडिया पर एक दावा वायरल हो रहा है कि मनमोहन सिंह सरकार ने 11 लाख नए सरकारी स्कूल बनवाए थे। लेकिन सरकारी आंकड़े और इतिहास कुछ और ही तस्वीर दिखाते हैं:

11 लाख स्कूल एक साथ नहीं आए: आज़ादी के बाद से भारत में सरकारी स्कूलों की संख्या धीरे-धीरे 11.07 लाख तक पहुँच गई है। UPA सरकार के समय में, 2009 में ऐतिहासिक ‘राइट टू एजुकेशन’ (RTE) एक्ट लाकर शिक्षा को मज़बूत करने की बड़ी कोशिश की गई थी, लेकिन ये सभी स्कूल किसी एक सरकार के समय में रातों-रात एक साथ नहीं आए।

गरीब बच्चों के लिए इंतज़ाम: RTE एक्ट के तहत, प्राइवेट स्कूलों में गरीब और पिछड़े ग्रुप के बच्चों के लिए 25% सीटें रिज़र्व करने का इंतज़ाम किया गया, ताकि कमज़ोर तबके के बच्चे भी हायर एजुकेशन पा सकें।

2014 के बाद पिछले 10 सालों में क्या बदला? 94,000 स्कूल क्यों बंद हो गए? नीति आयोग की ताज़ा रिपोर्ट और संसद में पेश किए गए सरकारी डेटा के मुताबिक, पिछले एक दशक में देश में सरकारी स्कूलों की संख्या 11.07 लाख (2014-15) से घटकर लगभग 10.13 लाख (2024-25) हो गई है। यानी, करीब 94,000 सरकारी स्कूल बंद हो गए हैं या उनकी संख्या कम हो गई है। लेकिन यह कोई ‘सीक्रेट स्कैम’ नहीं है, इसके लिए सरकार की एक खास पॉलिसी और बदलते सामाजिक हालात ज़िम्मेदार हैं:

स्कूल मर्जर: सरकार ने कम संख्या वाले और एक-दूसरे के पास मौजूद सरकारी स्कूलों को मर्ज करने की पॉलिसी अपनाई है। अकेले उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में ऐसे करीब 40,000 स्कूल मर्ज किए गए हैं। सरकार का तर्क है कि इससे रिसोर्स और टीचरों की कमी दूर होती है।

जन्म दर में कमी और कम रजिस्ट्रेशन: देश में घटती फर्टिलिटी रेट (जन्म दर) की वजह से स्कूल जाने लायक बच्चों की आबादी में कमी आई है। पिछले 10 सालों में स्कूलों में एडमिशन लेने वाले कुल स्टूडेंट्स की संख्या में 2.26 करोड़ की कमी आई है।

प्राइवेट स्कूलों की बाढ़: इसी समय में सरकारी स्कूलों की संख्या में कमी आई है, लेकिन प्राइवेट स्कूलों की संख्या 2.88 लाख से बढ़कर 3.39 लाख हो गई है, जिससे पता चलता है कि प्राइवेट शिक्षा की तरफ पेरेंट्स का झुकाव बढ़ा है।

क्या यह सच में एक स्कैम है या एडमिनिस्ट्रेटिव प्रोसेस?

एक तरफ, एजुकेशन एक्सपर्ट्स इस बात पर चिंता जता रहे हैं कि ग्रामीण इलाकों में सरकारी स्कूलों के बंद होने या मर्ज होने से गरीब बच्चों के लिए शिक्षा तक पहुंच का अंतर बढ़ गया है, जिससे ड्रॉप-आउट रेश्यो बढ़ सकता है। दूसरी तरफ, सरकार इस प्रोसेस को एडमिनिस्ट्रेटिव रिफॉर्म और ‘रैशनलाइजेशन’ कह रही है।

इस स्थिति को देश के हित में लिया गया एडमिनिस्ट्रेटिव फैसला माना जाए या गरीबों के शिक्षा के अधिकार पर अतिक्रमण, यह अब देश के जागरूक नागरिकों को तय करना है।

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