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PM मोदी के न्यूज़ीलैंड दौरे पर ‘प्रेस कॉन्फ्रेंस’ को लेकर विवाद: महिला पत्रकार के तीखे सवाल पर विदेश मंत्रालय के सचिव ने दिया जवाब

नॉर्वेजियन पत्रकार हेला लैंग के बाद अब न्यूज़ीलैंड में भी प्रेस की आज़ादी का मुद्दा उठा; सोशल मीडिया पर चर्चा तेज़

वेलिंगटन/नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विदेशी दौरे हमेशा दुनिया भर में सुर्खियां बटोरते हैं, लेकिन इस बार न्यूज़ीलैंड दौरे के दौरान एक अलग मुद्दे ने सोशल मीडिया पर हलचल मचा दी है। न्यूज़ीलैंड पहुंचे PM मोदी ने वहां द्विपक्षीय बातचीत तो की, लेकिन उन्होंने मीडिया के सामने प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों नहीं की? एक महिला पत्रकार ने विदेश मंत्रालय के सामने सीधे यह सवाल उठाया है, जिससे प्रेस की आज़ादी और प्रधानमंत्री की मीडिया रणनीति को लेकर चर्चाओं का बाज़ार फिर से गर्म हो गया है।

पत्रकार के सवाल पर विदेश मंत्रालय की सफाई

न्यूज़ीलैंड दौरे के दौरान जब मीडिया ब्रीफिंग चल रही थी, तो वहां मौजूद एक महिला पत्रकार ने पूछा, “प्रधानमंत्री मोदी सिर्फ़ संयुक्त बयान देकर क्यों चले जाते हैं? वे पत्रकारों के सीधे सवालों का जवाब देने के लिए खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों नहीं करते?”

इस तीखे सवाल का जवाब देते हुए भारतीय विदेश मंत्रालय के सचिव ने कूटनीतिक अंदाज़ में अपना बचाव किया और कहा, “किसी भी विदेशी दौरे के दौरान मीडिया से बातचीत करने का एक खास प्रोटोकॉल और समय सीमा होती है। दोनों देशों की आपसी सहमति और प्रशासनिक सुविधा के अनुसार संयुक्त प्रेस बयान जारी करने की परंपरा रही है, जिसके तहत सभी महत्वपूर्ण फैसलों और समझौतों की जानकारी आधिकारिक तौर पर मीडिया के सामने रखी जाती है।”

हालांकि, पत्रकार इस प्रशासनिक जवाब से संतुष्ट नज़र नहीं आए।

पुराना विवाद फिर ताज़ा: नॉर्वेजियन पत्रकार का मामला याद आया

यहां यह बताना ज़रूरी है कि इस तरह का विवाद पहली बार नहीं हुआ है। कुछ समय पहले, जब PM मोदी ने नॉर्वे का दौरा किया था, तब वरिष्ठ महिला पत्रकार हेला लैंग ने भी यही मुद्दा ज़ोर-शोर से उठाया था। हेला लैंग ने PM मोदी के प्रेस कॉन्फ्रेंस न करने के अंदाज़ और भारत में प्रेस की आज़ादी की स्थिति को लेकर तीखे सवाल उठाए थे, जो उस समय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गए थे। अब, न्यूज़ीलैंड में भी वही कहानी दोहराए जाने से विपक्ष और सोशल।
मीडिया यूज़र्स को सरकार को घेरने का एक और मौका मिल गया है।

‘महानगर मेट्रो ‘ से सीधा सवाल: सवालों से दूरी क्यों? लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तंभ माना जाता है। जब भारत के प्रधानमंत्री विदेश जाते हैं, तो वहां का लोकतांत्रिक मीडिया उनसे यह उम्मीद करता है कि वे उस देश के प्रमुख से सीधे सवाल पूछ सकें। सरकार भले ही इसके लिए समय और प्रोटोकॉल का बहाना बनाए, लेकिन विदेशी पत्रकारों द्वारा बार-बार पूछे जाने वाले ये सवाल किसी न किसी तरह वैश्विक मंच पर भारत की ‘प्रेस की आज़ादी’ की छवि को प्रभावित करते हैं।

महानगर मेट्रो ‘ का सवाल है कि अगर देश का सिस्टम मज़बूत है और फ़ैसले सही हैं, तो फिर वैश्विक पत्रकारों के तीखे सवालों का सामना करने में हिचकिचाहट क्यों है?

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