आज़ादी से पहले, कलम क्रांति का हथियार थी। हर शब्द ब्रिटिश शासन की नींद उड़ा देता था। लेकिन आज़ादी के बाद, देश में एक नया खेल शुरू हुआ। कलम को धारदार बनाए रखने के बजाय, सत्ता में बैठे लोगों ने उसे खरीदना और पालतू बनाना शुरू कर दिया। कुछ बुद्धिजीवियों की सरकारी नौकरियां छीन ली गईं, जबकि दूसरों को बड़े सरकारी पुरस्कार और पद्म सम्मान देकर चुप करा दिया गया। नतीजा यह हुआ कि जो कलम लोगों की आवाज़ होनी चाहिए थी, वह सत्ताधारियों की तारीफ़ों के दलदल में बुरी तरह फंस गई!
पैसे और मजे के लिए लिखना: सच्चाई गायब, बस अंधभक्ति का बोलबाला!
जब लिखने का मकसद देश या समाज का भला न होकर सिर्फ़ पैसा कमाना और मज़ा करना रह जाता है, तो साहित्य का पतन तय है। आज़ादी के बाद, देश में ऐसे लेखकों, कवियों और कलाकारों का एक पूरा वर्ग उभरा, जिन्होंने बिना किसी नैतिकता के, सत्ता के दबाव में अपनी मर्ज़ी से शासकों के गुणगान और चाटुकारिता शुरू कर दी। चारों तरफ़ बस एक ही आवाज़ सुनाई देने लगी— ‘जय हो, जय हो!’ शासक बदले लेकिन चाटुकारों की नीति नहीं बदली। कल वे उसकी पूजा करते थे, आज हम इसकी पूजा करते हैं! बस इतना ही, इसके अलावा आज के तथाकथित बुद्धिजीवियों में कोई और फ़र्क नहीं है।
लोकतंत्र का एक ऐसा घर जिसकी कोई परछाई नहीं: अंदर सिर्फ़ कंकाल हैं!
इस पूरी स्थिति को देखकर लगता है कि समाज में विचारधारा का एक बड़ा घर खड़ा है, लेकिन इसकी कोई असलियत या परछाई नहीं है। भले ही इस वैचारिक घर में हर दिन नए चेहरे, नई पीढ़ियां और नए कंकाल सजाए जा रहे हों, लेकिन इसमें रहने वाले लोगों की असली आवाज़ कहाँ है? अगर कलम चलाने वाला हाथ सत्ता या पैसे के इशारे पर चल रहा है, तो वह आवाज़ आत्मा की नहीं, बल्कि मालिक के इशारे पर भौंकने वाले गुलाम की आवाज़ है। अपनी विचारधारा को गिरवी रखकर जीने वाले ये बुद्धिजीवी समाज को कभी सही रास्ता नहीं दिखा सकते।
‘महानगर मेट्रो न्यूज़’ की ग्राउंड रिपोर्ट और आक्रोश:
बिकाऊ बौद्धिकता: जब देश के रचनाकार पुरस्कारों और ओहदों के लालच में बिक जाते हैं, तो जनता की तरफ से लड़ने वाला कोई नहीं बचता।
भक्ति का बदलता रुख: कल जो लोग पुरानी सरकार की तारीफ़ करते थे, आज वे नई सरकार की आरती उतार रहे हैं। यह रवैया अभिव्यक्ति की आज़ादी और पत्रकारिता पर सबसे बड़ा दाग है।
एक सच्ची आवाज़ की ज़रूरत: आज देश को ऐसे लेखकों और पत्रकारों की ज़रूरत है जो सरकार की तारीफ़ के जाल में फँसने के बजाय, शासकों की आँखों में आँखें डालकर जनता के मुद्दों पर सवाल पूछ सकें।
जिनकी लेखनी सरकारी मेहरबानियों पर टिकी हो, वे कभी क्रांति नहीं ला सकते। ‘पक्को गुजरात न्यूज़’ ऐसे सभी ‘कलम के सौदागरों’ की आलोचना करता है और कहता है कि अगर देश सच में बदलना चाहता है, तो कलम को सरकार की गुलामी से आज़ाद करना होगा।

