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श्रीमद्भगवद्गीता श्रृंखला: अध्याय – ६ (आत्मसंयम योग)

मन मित्र है या शत्रु? “योग का अर्थ दुनिया से दूर भागना नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर स्थिर होना है।”

कर्म का पथ पत्थर की लकीर है, और मन उसका शिल्पी (मूर्तिकार) है। यदि शिल्पी के हाथ में संयम की छैनी होगी, तो जीवन एक सुंदर मूर्ति बनेगा; अन्यथा वह मात्र एक पत्थर बनकर रह जाएगा।

पिछले अध्याय में हमने देखा कि संसार में रहकर, अपने कर्तव्यों को निभाते हुए भी संन्यासी कैसे बना जा सकता है। लेकिन अर्जुन और हम सभी के मन में एक बड़ा सवाल उठता है: “हे कृष्ण, ये सभी बड़ी बातें सुनने में बहुत अच्छी लगती हैं, लेकिन जब संसार की आपाधापी के बीच कोई तनाव आता है, तब मन भटक जाता है। इस चंचल मन को वश में कैसे रखा जाए?”

आज के डिजिटल युग में यह समस्या १० गुना*बढ़ गई है। सुबह आँख खुलने से लेकर रात को सोने तक हमारा मन सोशल मीडिया के नोटिफिकेशन्स, रील्स की स्क्रॉलिंग और डिजिटल डिस्ट्रैक्शन (भटकाव) के जाल में फंसा रहता है। यह आज के जमाने का अर्जुन जैसा ही युद्ध है।

हम अक्सर यह मान लेते हैं कि मन पर नियंत्रण करने का अर्थ है हमारी स्वतंत्रता का छिन जाना। लेकिन वास्तव में आत्मसंयम स्वयं पर लगाया गया एक पवित्र बंधन है, जो हमें नकारात्मकता से बचाता है। रामायण में लक्ष्मण जी ने सीता जी की रक्षा के लिए ‘लक्ष्मण रेखा’ खींची थी। जब तक सीता जी उस रेखा के भीतर थीं, तब तक रावण जैसे शक्तिशाली राक्षस में भी इतनी ताकत नहीं थी कि वह उनका बाल भी बांका कर सके। लेकिन जैसे ही मन अति-दया या मोहवश होकर संयम की उस रेखा को पार कर गया, वैसे ही मुसीबतों की शुरुआत हो गई।

हमारे जीवन में भी नैतिकता, नियमितता और मर्यादा की एक ‘लक्ष्मण रेखा’ होनी चाहिए। आत्मसंयम हमें बांधता नहीं है, बल्कि रावण रूपी दुर्गुणों और सोशल मीडिया के भटकावों से हमारी रक्षा करता है।

एक धनुर्धर के पास तीन प्रकार के तीर होते हैं:

૧. जो अतीत के स्टोर में पड़े हैं, जिनका अभी तक उपयोग नहीं हुआ है।
૨. जो कमान से छूट चुका है, जिसे वापस नहीं लौटाया जा सकता और उसका परिणाम भुगतना ही पड़ता है (जैसे हमारा वर्तमान जीवन और परिस्थितियाँ)।
૩. और जो इस समय ठीक हमारे हाथ में है, जिसे हम जहाँ चाहें वहाँ छोड़ सकते हैं।

जो तीर छूट चुका है उस पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है। लेकिन जो तीर अभी कमान पर है (अर्थात हमारा वर्तमान समय), उसे किस दिशा में छोड़ना है, यह पूरी तरह से केवल और केवल हम पर निर्भर करता है। यदि इस समय मन वश में होगा, तो भविष्य का तरकश (कर्म) अपने आप सुधर जाएगा।

जब गुरु द्रोणाचार्य ने वृक्ष पर रखे नकली पक्षी की आँख पर निशाना लगाने की परीक्षा ली, तब अन्य राजकुमारों को वृक्ष, पत्ते, आकाश और पूरा पक्षी दिखाई दे
रहा था। लेकिन जब अर्जुन से पूछा गया, तब उनका सटीक उत्तर था: “गुरुदेव, मुझे केवल पक्षी की आँख ही दिखाई दे रही है, और कुछ भी नहीं।” आज के समय में जो पक्षी की आँख है, वह हमारा ‘लक्ष्य’ है और जो पत्ते, डालियाँ या आकाश हैं, वे सोशल मीडिया के डिस्ट्रैक्शन हैं। अर्जुन जैसा आत्मसंयम ही हमें भटकने से बचाता है।

कर्म का सिद्धांत बहुत स्पष्ट और अटल है। यदि आप किसी गहरे कुएं में जाकर चिल्लाएंगे कि “मैं तुमसे नफरत करता हूँ”, तो कुएं से वही आवाज वापस आएगी। लेकिन यदि आप कहेंगे “मैं तुमसे प्यार करता हूँ”, तो प्यार की ही गूंज सुनाई देगी।

हमारा मन भी इसी कुएं की तरह है। यदि आत्मसंयम के अभाव में हम मन में ईर्ष्या, क्रोध, आलस्य या नकारात्मक विचार डालेंगे, तो कार्मिक नियम के अनुसार हमें जीवन में वही वापस मिलेगा। मन को संयमित रखकर उसमें लगातार सकारात्मक और सेवा के विचार बोना ही सर्वश्रेष्ठ कर्म है।

सितार या गिटार के तार यदि बहुत ज्यादा खींच दिए जाएं तो वे टूट जाते हैं, और यदि बिल्कुल ढीले छोड़ दिए जाएं तो उनमें से सुर ही नहीं निकलता। जीवन का संगीत भी तभी मधुर बनता है जब आहार, विहार, नींद और काम, सब कुछ ‘Balance’ यानी संतुलित हो।

जब अर्जुन कहते हैं कि “कृष्ण, यह मन तो वायु की तरह चंचल है, इसे रोकना असंभव है!” तब जगद्गुरु बहुत ही व्यावहारिक समाधान देते हैं.

मन को ‘अभ्यास’ और ‘वैराग्य’ से वश में किया जा सकता है। हर रोज मन भागे तो उसे प्रेम से वापस लाओ (अभ्यास) और हर नोटिफिकेशन या ट्रेंड के पीछे भागना जरूरी नहीं है, इतना वैराग्य विकसित करो।

इस अध्याय का सबसे शक्तिशाली मंत्र यह है कि: “आप ही अपने उद्धारक हैं और आप ही अपने शत्रु हैं।” यदि आपके पास सेल्फ-कंट्रोल (आत्म-नियंत्रण) है, तो आप विजेता हैं।

सब कुछ छोड़कर जंगल में जाकर आँखें बंद करना आसान हो सकता है, लेकिन मोबाइल स्क्रीन सामने होने के बावजूद, सोशल मीडिया की दुनिया के बीच रहने के बावजूद, रचनात्मक कर्म करते हुए अपने मन की शांति बनाए रखना… यही सच्चा ‘आत्मसंयम योग’ है!

(क्रमशः: आगामी अध्याय ७ में हम समझेंगे ‘ज्ञानविज्ञान योग’—ईश्वर का सही पता कहाँ है? विज्ञान और आध्यात्मिकता का अद्भुत समन्वय!)

दर्शना पटेल (नेशनल मेडलिस्ट) स्पोर्ट्स टीचर।

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