पावी जेतपुर के सिहोद ब्रिज से लेकर तेजगढ़ तक अवैध रेत खनन का महाजाल | दिन-रात सीना चीर रही हैं जेसीबी मशीनें, जनता के तीखे सवालों से हिला प्रशासन

छोटाउदयेपुर : प्रशासन भले ही २४ घंटे में ३३ गाड़ियां पकड़कर अपनी पीठ थपथपा रहा हो, लेकिन जमीन पर हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। गुजरात के छोटाउदयेपुर जिले के पावी जेतपुर तालुका सहित कई ग्रामीण इलाकों में बहने वाली नदियां आज खनन माफियाओं के लालच की बलि चढ़ रही हैं। स्थानीय जनता त्राहि-त्राहि कर रही है, नदियों के पाट खोखले हो रहे हैं और सरकारी खजाने को करोड़ों रुपये का चूना लगाया जा रहा है। इसके बावजूद, जिम्मेदार खान-खनिज विभाग (Mining Department) और स्थानीय प्रशासन मौन साधे बैठा है, जिससे अब जनता का गुस्सा फूट पड़ा है।
माफियाओं के ‘हॉटस्पॉट’: जहां कानून बौना साबित हो रहा है!
स्थानीय ग्रामीणों के गंभीर आरोपों के मुताबिक, यह काला कारोबार किसी एक इलाके तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका नेटवर्क करोड़ों रुपये का है:
सिहोद ब्रिज (पावी जेतपुर): पुल के आस-पास के प्रतिबंधित क्षेत्रों से भी रातों-रात रेत उठाई जा रही है, जिससे भविष्य में इस मुख्य पुल के अस्तित्व पर ही खतरा मंडराने लगा है।
नालेज और पादरवाट: इन ग्रामीण इलाकों की सीमा से गुजरने वाली नदियां मानो खनन माफियाओं की जागीर बन चुकी हैं। यहाँ दिन-रात नियमों को ताक पर रखकर रेत निकाली जा रही है।
ओली अंबा और तेजगढ़: इन इलाकों में ट्रैक्टरों की पूरी फौज अवैध रेत भरकर हाईवे पर सीना ताने दौड़ती नजर आती है।

ग्राउंड रियलिटी: आम जनता पर डंडा, माफियाओं को खुली छूट?
इलाके के चौक-चौराहों पर आज सिर्फ एक ही चर्चा है कि, “जब कोई आम इंसान अपने घर के निर्माण के लिए एक ट्रैक्टर रेत लाता है, तो प्रशासन तुरंत जुर्माना ठोक देता है। तो फिर ये माफिया रोज सैकड़ों ट्रक और ट्रैक्टर किसकी शह पर खाली कर रहे हैं?”
अवैध खनन का खेल अब सिर्फ रात के अंधेरे में नहीं, बल्कि दिन के उजाले में भी बेखौफ चल रहा है। ओवरलोड भरे ये वाहन ग्रामीण सड़कों से इतनी तेज रफ्तार में गुजरते हैं कि रास्ते पूरी तरह जर्जर हो चुके हैं और आए दिन हादसों का डर बना रहता है। लेकिन माइनिंग डिपार्टमेंट के अधिकारी अपनी एसी केबिनों से बाहर निकलने को तैयार नहीं हैं।
महानगर मेट्रो के सीधे और तीखे सवाल:
१. हफ्ताखोरी का गणित क्या है? – रोज आंखों के सामने से गुजरने वाले सैकड़ों अवैध वाहन स्थानीय पुलिस और माइनिंग विभाग को क्यों नहीं दिखते? क्या माफियाओं और सफेदपोशों के बीच कोई ‘गठजोड़’ काम कर रहा है?
२. सिर्फ त्योहारों या छुट्टियों में ही नाटक क्यों? – प्रशासन लंबी छुट्टियों के दिनों में स्पेशल ड्राइव चलाकर खानापूर्ति कर लेता है, लेकिन बाकी के ३६५ दिन इन इलाकों में नियमित चेकिंग क्यों नहीं की जाती?
३. सफेदपोश आकाओं पर हाथ कब डाला जाएगा? – हर बार केवल गरीब ड्राइवर या ट्रैक्टर मालिक ही पकड़े जाते हैं, लेकिन इस पूरे खेल के पीछे जो मुख्य सूत्रधार (किंगपिन) बैठे हैं, उन तक कानून के हाथ कब पहुंचेंगे?
४. पारदर्शी जांच से क्यों डर रहा है प्रशासन? – स्थानीय लोग लगातार मांग कर रहे हैं कि इन इलाकों की वीडियोग्राफी कराकर जांच की जाए, तो फिर विभाग इस पर चुप्पी क्यों साधे है?

अफसरों का रहस्यमयी मौन: दाल में कुछ काला है या पूरी दाल ही काली है?
इस पूरे सुलगते मामले पर जब हमारी टीम ने संबंधित विभाग के अधिकारियों से उनका आधिकारिक पक्ष जानने की कोशिश की, तो हमेशा की तरह ‘साहब’ व्यस्त होने का बहाना बनाकर कैमरों और सवालों से बचते नजर आए। अधिकारियों का यह मौन ही साफ करता है कि कहीं न कहीं पाप का घड़ा भर चुका है।
जनता की आखिरी चेतावनी!
सिहोद, नालेज, पादरवाट और तेजगढ़ की जनता ने अब आर-पार की लड़ाई का मूड बना लिया है। ग्रामीणों ने साफ चेतावनी दी है कि अगर आने वाले दिनों में इस अवैध खनन को स्थायी रूप से बंद नहीं किया गया और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई नहीं हुई, तो वे सड़कों पर उतरकर उग्र आंदोलन करेंगे। अब देखना यह होगा कि ‘जीरो टॉलरेंस’ का दम भरने वाला प्रशासन वाकई कोई कड़ा एक्शन लेता है या माफियाओं के आगे नतमस्तक ही रहता है!
विशेष रिपोर्ट: महानगर मेट्रो न्यूज़ (जनता की बुलंद आवाज)

