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गुजरात का किसान आंदोलन फिर राजनीति की भेंट चढ़ा: नेताओं की हीरो बनने की होड़ ने किसानों की लड़ाई को कमजोर किया, सरकार को कुछ करने की जरूरत ही नहीं पड़ी!

आंदोलन में एकता की जगह श्रेय लेने की राजनीति हावी रही। नेताओं की आपसी बयानबाजी और गुटबाजी के बीच किसानों के मूल मुद्दे पीछे छूट गए।


गुजरात का किसान आंदोलन फिर राजनीति के होमकुंड में स्वाहा

गुजरात और आंदोलनों का इतिहास काफी पुराना रहा है, लेकिन हाल का किसान आंदोलन एक ऐसा अध्याय जोड़ गया है जो किसानों और विपक्षी राजनीति दोनों के लिए गंभीर आत्ममंथन का विषय है। किसानों का गुस्सा और उनके मुद्दों को लेकर सड़क पर उतरने का संकल्प यह संकेत दे रहा था कि इस बार संघर्ष लंबा और निर्णायक हो सकता है। लेकिन दिन ढलते-ढलते वही हुआ जिसकी आशंका पहले से जताई जा रही थी—आंदोलन में दरार पड़ गई, नेता आपस में उलझ गए और किसानों की लड़ाई राजनीतिक खींचतान का शिकार बन गई।

तैयार मंच पर राजनीति, किसानों के मुद्दे पीछे

मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस से अपेक्षा थी कि वह किसानों के मुद्दों को मजबूती से उठाएगी और आंदोलन को दिशा देगी। लेकिन जिस परिपक्वता की उम्मीद थी, वह दिखाई नहीं दी। किसानों के अधिकारों और समस्याओं पर केंद्रित रहने के बजाय आंदोलन में श्रेय लेने और नेतृत्व स्थापित करने की होड़ देखने को मिली।

लालजी देसाई और पाल आंबलिया के बीच हुई बयानबाजी ने एक बड़े आंदोलन की संभावनाओं को कमजोर कर दिया। ऐसा लगा मानो किसानों के मुद्दों से अधिक चिंता इस बात की थी कि आंदोलन का चेहरा कौन बनेगा और राजनीतिक लाभ किसे मिलेगा।

सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि जिन आंदोलनों को दबाने में सरकार को अक्सर पूरी ताकत लगानी पड़ती है, इस बार सरकार को कोई विशेष प्रयास करने की जरूरत ही नहीं पड़ी। आंदोलन से जुड़े लोग और विपक्षी नेता स्वयं आपसी मतभेदों में उलझकर आंदोलन को कमजोर कर बैठे।

आम आदमी पार्टी भी नहीं दिखी प्रभावी

दूसरी ओर, किसानों के इस संघर्ष में आम आदमी पार्टी की सक्रिय और प्रभावी मौजूदगी भी दिखाई नहीं दी। विपक्ष की ओर से जिस संयुक्त रणनीति और राजनीतिक परिपक्वता की जरूरत थी, वह पूरी तरह नदारद रही।

किसानों के मुद्दों की लड़ाई धीरे-धीरे इस सवाल में बदल गई कि कौन बड़ा किसान नेता बनेगा और किसे अधिक राजनीतिक पहचान मिलेगी। इस अहंकार और प्रतिस्पर्धा की राजनीति में किसानों की वास्तविक समस्याएं पीछे छूट गईं।

गुजरात की विपक्षी राजनीति की हकीकत यही है कि जब तक कांग्रेस और आम आदमी पार्टी किसान, मजदूर और जनहित के मुद्दों पर एक मंच पर आने को तैयार नहीं होंगी, तब तक वे एक-दूसरे से ही प्रतिस्पर्धा करती रहेंगी और सत्ता पक्ष को इसका लाभ मिलता रहेगा।

नेताओं की पीड़ा और किसानों के लिए संदेश

पाल आंबलिया की जमीनी मेहनत और किसानों के लिए किए गए प्रयासों को नकारा नहीं जा सकता। लेकिन जब आंदोलन टूटने के बाद उनकी आंखों में निराशा दिखाई दे और वे यह कहें कि अब किसानों की लड़ाई नहीं लड़ना चाहते, तो यह केवल एक नेता की हताशा नहीं बल्कि पूरे आंदोलन की विफलता का संकेत है।

किसानों को भी यह समझना होगा कि जो लोग उनके मुद्दों के लिए संघर्ष कर रहे हैं, उनके प्रति संवेदनशीलता और एकजुटता बनाए रखना भी आवश्यक है। अतीत में राजू करपड़ा जैसे नेताओं के साथ भी इसी प्रकार की परिस्थितियां देखने को मिली थीं।

पंजाब के किसानों से सीख लेने की जरूरत

गुजरात के किसान संगठनों और नेताओं को पंजाब के किसान आंदोलनों से सीख लेने की आवश्यकता है। वहां वैचारिक मतभेद होने के बावजूद किसान हितों के मुद्दे पर संगठन एकजुट रहते हैं और साझा रणनीति के साथ संघर्ष करते हैं।

इसके विपरीत गुजरात में कई बार सुबह शुरू हुआ किसान आक्रोश शाम तक राजनीतिक खींचतान और नेतृत्व विवाद का शिकार बन जाता है। परिणामस्वरूप किसानों की मांगें और समस्याएं फिर पीछे छूट जाती हैं।

अंतिम सवाल

आज फिर एक बार ऐसा प्रतीत हुआ कि नेताओं की श्रेय लेने की राजनीति और विपक्ष की कमजोर रणनीति के कारण सबसे बड़ा नुकसान किसान को ही उठाना पड़ा। नेता अपने-अपने रास्ते चले गए, लेकिन खेतों में मेहनत करने वाला किसान वहीं खड़ा है जहां वह आंदोलन शुरू होने से पहले था।

नेतृत्व भले ही इस परीक्षा में असफल साबित हुआ हो, लेकिन अपने अधिकारों और न्याय की मांग के लिए सड़क पर उतरे किसानों के संघर्ष को सलाम किया जाना चाहिए। सवाल केवल इतना है कि किसान कब तक राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और नेताओं की आपसी प्रतिस्पर्धा का साधन बनते रहेंगे?

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