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अदालत का कड़ा रुख: पति ‘नपुंसक’ है तो सबूत कहां? बिना प्रमाण आरोपों पर हाईकोर्ट ने ठुकराई तलाक की अर्जी

विशेष रिपोर्ट : पत्नी ने की थी 90 लाख रुपये के मुआवजे की मांग, कोर्ट ने कहा— ‘महज आरोपों से क्रूरता साबित नहीं होती’

महानगर मेट्रो ब्यूरो, अहमदाबाद : हाईकोर्ट ने हाल ही में वैवाहिक विवाद के एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए पत्नी द्वारा दायर तलाक की याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि अगर पत्नी अपने पति पर नपुंसकता (Impotency) या शारीरिक अक्षमता का आरोप लगाती है, तो उसे पुख्ता सबूत पेश करने होंगे। बिना मेडिकल सबूत के ऐसे गंभीर आरोप लगाना न केवल गलत है, बल्कि पति के प्रति मानसिक क्रूरता भी हो सकता है।

क्या था मामला?

दंपति की शादी दिसंबर 2013 में हुई थी। शादी के कुछ समय बाद पत्नी ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और शादी रद्द करने के साथ-साथ 90 लाख रुपये के स्थायी गुजारा भत्ते (Alimony) की मांग की। पत्नी का मुख्य आधार यह था कि उनका विवाह कभी ‘पूर्ण’ (Consummated) नहीं हुआ क्योंकि उसका पति
‘इरेक्टाइल डिस्फंक्शन’ से पीड़ित है।

हनीमून का जिक्र और बीमारी के दावे : महिला ने अदालत में दलील दी कि :

वर्ष 2013 में केरल और 2014 में कश्मीर के हनीमून ट्रिप के दौरान भी पति शारीरिक संबंध बनाने में असमर्थ रहा।
पति ने अपनी बीमारी ‘रुमेटोइड आर्थराइटिस’ (Rheumatoid Arthritis) की बात छिपाई थी, जिसकी वजह से उसे शारीरिक अक्षमता हुई।
महिला ने 2017 के एक मेडिकल डायग्नोसिस का हवाला देते हुए दावा किया कि पति वैवाहिक जीवन और संतानोत्पत्ति के लिए ‘अयोग्य’ है।

कोर्ट का तीखा सवाल: ‘सबूत कहां हैं?’

जब मामला हाईकोर्ट पहुंचा, तो अदालत ने महिला से सीधा सवाल किया— “आपके पास इस बात के क्या वैज्ञानिक या पुख्ता मेडिकल प्रमाण हैं कि आपका पति नपुंसक है?”

अदालत ने पाया कि:
1 पत्नी द्वारा लगाए गए आरोपों की पुष्टि के लिए कोई ठोस मेडिकल रिपोर्ट पेश नहीं की गई।
2 पति ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया था।
3 कोर्ट ने माना कि बिना किसी विश्वसनीय साक्ष्य के ऐसे आरोप लगाना ‘हिंदू विवाह अधिनियम, 1955’ के तहत तलाक का आधार नहीं बन सकते, खासकर जब क्रूरता सिद्ध न हो।

फैसला : याचिका खारिज

अदालत ने महिला की बातों को अपर्याप्त मानते हुए केस को फाल कर दिया। इस फैसले ने स्पष्ट कर दिया है कि वैवाहिक जीवन में शारीरिक अक्षमता के आरोपों को कानूनी रूप से सिद्ध करने के लिए केवल बयानों की नहीं, बल्कि ठोस डॉक्टरी सबूतों की आवश्यकता होती है।

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