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विशेष रिपोर्ट: कोख पर ‘कोयता’ का प्रहार – मज़दूरी की खातिर शरीर से खिलवाड़

हेडलाइन: ‘बच्चेदानी’ या ‘जुर्माना’? बीड से गुजरात तक मजदूरी के दलदल में पिसती औरतों की चीख!

ब्यूरो रिपोर्ट | महानगर मेट्रो : अहमदाबाद/बीड : महाराष्ट्र के बीड जिले से उठी एक दर्दनाक खबर ने आज पूरे देश की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया है। यह कहानी किसी बीमारी की नहीं, बल्कि उस भयानक शोषण की है जहाँ गरीबी एक महिला के शरीर के सबसे महत्वपूर्ण अंग यानी उसके ‘गर्भाशय’ (Uterus) को निगल रही है। लगभग 13,000 से अधिक महिलाओं ने अपनी कोख सिर्फ इसलिए निकलवा दी ताकि वे बिना किसी रुकावट के गन्ने के खेतों में काम कर सकें।

मजबूरी का सौदा: ₹500 का डर और ‘मुकदम’ का कोड़ा

गन्ना कटाई के काम में लगे इन ‘कोयता’ मजदूरों के नियम रूह कंपा देने वाले हैं। इन मजदूरों को काम पर रखने वाले ठेकेदार (मुकदम) का नियम स्पष्ट है: “मासिक धर्म (Periods) के कारण एक दिन की छुट्टी यानी ₹500 से ₹1000 का जुर्माना।”

खेतों में न शौचालय है, न पानी, न आराम। धूल और गंदगी के बीच इन्फेक्शन के डर और भारी आर्थिक दंड से बचने के लिए इन महिलाओं को एक ही रास्ता
सूझा— हिस्टेरेक्टॉमी (Hysterectomy) यानी गर्ભાशय निकलवाना।

गुजरात में भी सुलग रही है आग?

चिंताजनक बात यह है कि इसी तरह की खबरें गुजरात के ठाकोर समाज और अन्य श्रमिक वर्गों से भी छनकर आ रही हैं। यहाँ भी मजदूरी करने वाली महिलाएं इसी तरह के शारीरिक शोषण का शिकार हो सकती हैं। साक्ष्यों और शिक्षा के अभाव में ये मामले दबे रह जाते हैं, लेकिन “धुआं उठा है तो आग कहीं न कहीं जरूर होगी।” क्या गुजरात के खेतों में भी कोख का सौदा हो रहा है? यह जांच का गंभीर विषय है।

विशेषज्ञ राय: ईंट निकली तो ढह जाएगी दीवार

स्त्री रोग विशेषज्ञों के अनुसार, गर्ભાशय को बिना चिकित्सा कारण के निकालना एक ‘आत्मघाती’ कदम है:
पेલ્વિક ऑर्गन प्रोलैप्स: गर्ભાशय केवल बच्चा पैदा करने के लिए नहीं है, यह मूत्राशय और मलाशय को सहारा देता है। इसे हटाने का मतलब है अन्य अंगों का अपनी जगह से खिसक जाना।
हड्डियों का खोखलापन: अंडाशय हटने से ‘एस्ट्रोजन’ हार्मोन खत्म हो जाता है, जिससे हड्डियां कांच की तरह कमजोर (ओस्टियोपोरोसिस) हो जाती हैं।
मानसिक और शारीरिक आघात: समय से पहले ‘मेनोपॉज’ आने से चिड़चिड़ापन, हॉट फ्लैशेस और हृदय रोगों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

महानगर मेट्रो का तीखा विश्लेषण: यह विकास है या विनाश?

“जिस समाज में एक औरत को अपना पेट पालने के लिए अपनी कोख गंवानी पड़े, उस समाज को खुद को सभ्य कहने का कोई अधिकार नहीं है।”
यह केवल गरीबी नहीं, बल्कि आधुनिक गुलामी है। ठेकेदारों की मनमानी और प्रशासन की चुप्पी ने इन महिलाओं को ‘जीती-जागती मशीन’ बना दिया है।
हमारी मांग और चेतावनी:

1 कड़ी जांच: महाराष्ट्र और गुजरात सरकार इन मामलों की उच्च स्तरीय जांच कराए।
2 श्रम कानूनों का सख्ती से पालन: खेतों में काम करने वाली महिलाओं के लिए शौचालय और मासिक धर्म के दौरान सवेतन अवकाश (Paid Leave) अनिवार्य हो।
3 जागरूकता: महिलाओं को यह समझाना जरूरी है कि गर्भाशय निकलवाना कोई ‘उपचार’ नहीं, बल्कि ताउम्र की बीमारी है।

सावधानी नोट: यह जानकारी केवल जन-जागृति के लिए है। गर्ભાशय निकलवाने जैसा बड़ा निर्णय केवल कैंसर या जानलेवा स्थिति में ही लें। किसी भी समस्या के लिए योग्य स्त्री रोग विशेषज्ञ से ही संपर्क करें।

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