अहमदाबाद | विशेष संवाददाता : गुजरात की जीवनरेखा कही जाने वाली गुजरात स्टेट ट्रांसपोर्ट (ST) को लेकर इन दिनों सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में एक बहस छिड़ी हुई है। दावा किया जा रहा है कि सरकार ‘छिपते-छिपाते’ विभाग का निजीकरण कर रही है। आरोप है कि सत्तापक्ष अपने करीबियों को फायदा पहुँचाने के लिए 1200 बसें किराए पर लेने की तैयारी में है। आइए समझते हैं इस पूरे गणित और इसके पीछे छिपे ‘कथित’ खेल को।
गणित जो चौंका देगा : अपनी बस बनाम किराए की बस
सोशल मीडिया पर वायरल दावों के अनुसार, पिछले दो वर्षों में जो बसें (ST और वोल्वो) किराए पर ली गई हैं, उनका वार्षिक किराया 156 करोड़ रुपये है।
10 साल का किराया: लगभग 2000 करोड़ रुपये।
नई बस खरीदने का खर्च: यदि सरकार खुद बसें खरीदे, तो यह काम मात्र 350 करोड़ रुपये में हो सकता है।
रखरखाव और वेतन: इसे मिलाकर भी 10 साल का खर्च अधिकतम 500 करोड़ रुपये होगा।
सवाल यह है : यदि काम 500-600 करोड़ में हो सकता है, तो जनता के टैक्स के 1500 करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च करके निजी ऑपरेटरों की जेब क्यों भरी जा रही है?
PPP मॉडल: विकास या कमीशन का रास्ता?
लेख में सरकार के PPP (Public Private Partnership) मॉडल पर कड़ा प्रहार किया गया है। इसे ‘पूंजीवादी ताकतों’ की साजिश बताते हुए कहा गया है कि:
1 भर्ती में नुकसान: निजी कंपनियां कर्मचारियों की भर्ती करेंगी, जिससे सरकारी लाभ और सुरक्षित वेतन खत्म होगा।
2 कमीशन का खेल: आरोप है कि टेंडर उन लोगों को दिए जाते हैं जो सत्ता के करीब हैं, जिससे पार्टी और नेताओं को मोटा ‘फंड’ मिलता है।
3 जनता पर बोझ: बस खाली चले या भरी, सरकार को किराया देना ही होगा। अंततः टिकट के दाम बढ़ेंगे और बोझ आम आदमी पर आएगा।
वैश्विक साजिश: ब्लैक रॉक (Blackrock) और ‘बड़े भाई’ का कनेक्शन
रिपोर्ट में एक सनसनीखेज दावा किया गया है कि भारत की नीतियों को दुनिया की सबसे बड़ी एसेट मैनेजमेंट कंपनी ब्लैक रॉक (Blackrock) जैसी संस्थाएं प्रभावित कर रही हैं।
कच्चे तेल का खेल: वेनेजुएला से कच्चा तेल आने, रूस-खाड़ी देशों के तेल पर प्रतिबंध लगने और भारत की सरकारी रिफाइनरी में ‘अचानक’ आग लगने की घटनाओं को एक कड़ी में जोड़ा गया है।
निष्कर्ष: इन सबका सीधा फायदा निजी रिफाइनरियों और ‘बड़े उद्योगपतियों’ को मिल रहा है।
महानगर मेट्रो का नजरिया
निजीकरण अगर कुशलता बढ़ाता है तो स्वागत योग्य है, लेकिन यदि यह सरकारी खजाने को चूना लगाकर निजी तिजोरियां भरने का माध्यम बन रहा है, तो यह चिंता का विषय है। गुजरात ST का मामला केवल बसों का नहीं, बल्कि पारदर्शी शासन और जनता के पैसे की जवाबदेही का है।

