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अमर शौर्यगाथा : भारतीय सेना के ‘रैम्बो’ मेजर सुधीर कुमार वालिया, जिन्होंने अंतिम सांस तक देश की रक्षा की

अहमदाबाद/हिमाचल | महानगर मेट्रो विशेष : भारत माँ के आंचल को सुरक्षित रखने के लिए हंसते-हंसते अपने प्राण न्योछावर करने वाले वीरों की सूची में एक नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है— मेजर सुधीर कुमार वालिया। 29 अगस्त 1999 को कुपवाड़ा के घने जंगलों में आतंकियों से लोहा लेते हुए उन्होंने जो पराक्रम दिखाया, वह आज भी हर भारतीय की रगों में देशभक्ति का संचार करता है।

साथियों के बीच कहलाते थे ‘रेम्बो’

9 पैरा (स्पेशल फोर्सेज) के जांबाज अधिकारी मेजर वालिया को उनके साथी सैयां ‘रैम्बो’ के नाम से बुलाते थे। उनकी निर्ભयता और युद्ध कौशल के कारण ही उन्हें यह उपाधि मिली थी। कर्नल आशुतोष काले द्वारा लिखित पुस्तक ‘रैम्बो’ उनके इसी अदम्य साहस और जीवन यात्रा को समर्पित है।

कुपवाड़ा का वो खूनी मुकाबला

कारगिल युद्ध के विजय अभियान के तुरंत बाद, मेजर वालिया को कुપवाड़ा में छिपे आतंकियों को खत्म करने का महत्वपूर्ण मिशन सौंपा गया।
तारीख: 29 अगस्त 1999
मिशन: आतंकियों के गुप्त ठिकाने को ध्वस्त करना।
साहस: भारी गोलीबारी के बीच मेजर वालिया ने अपनी टीम का नेतृत्व किया। दुश्मन की गोलियों ने उनके चेहरे, छाती और हाथों को छलनी कर दिया, लेकिन
‘रैम्बो’ का जज्बा नहीं डगमगाया।

खून की आखिरी बूंद तक लड़े

गंभीर रूप से घायल होने और अत्यधिक रक्तस्राव के बावजूद, उन्होंने पीछे हटने से इनकार कर दिया। अदम्य साहस का परिचय देते हुए उन्होंने अकेले ही चार खूंखार आतंकियों को मौत के घाट उतार दिया। जब तक मिशन सफल नहीं हो गया, वे डटे रहे और अंततः देश के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दे दिया।
मरणोपरांत ‘अशोक चक्र’ से सम्मान

मेजर सुधीर कुमार वालिया की इसी असाधारण वीरता के लिए उन्हें भारत के सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार ‘अशोक चक्र’ से सम्मानित किया गया। 26 जनवरी 2000 को गणतंत्र दिवस के अवसर पर, उनके पिता पूर्व सूबेदार मेजर रुलिया राम वालिया ने गर्व के साथ अपने वीर पुत्र की ओर से यह सम्मान प्राप्त किया।

“वीर मरते नहीं, वे हमारे दिलों में अमर हो जाते हैं। मेजर सुधीर कुमार वालिया का बलिदान आने वाली कई पीढ़ियों को राष्ट्र सेवा के लिए प्रेरित करता रहेगा।”

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