क्या देश की जनता ने कांग्रेस को खोकर बड़ी कीमत चुकाई है? इंटरनेट पर वायरल हो रहे 10 बिंदुओं ने बढ़ाया सियासी पारा।
अहमदाबाद : कहते हैं कि बेजुबान जानवर भी शाम ढलते ही अपने घर की राह पकड़ लेते हैं, लेकिन इंसान कभी-कभी अपनी दिशा चुनने में चूक कर जाता है। हाल ही में सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में एक बहस ने जोर पकड़ा है कि क्या कांग्रेस ने सत्ता खोई है या देश की जनता ने एक ‘दूरदर्शी’ नेतृत्व खो दिया है? महानगर मेट्रो आज उन 10 विवादास्पद और चर्चा में रहे बिंदुओं का विश्लेषण कर रहा है, जो वर्तमान राजनीति की नींव को झकझोर रहे हैं।
- शिक्षा और दूरदर्शिता की राजनीति
विमर्श यह है कि देश ‘जुमलों’ से नहीं, बल्कि शिक्षित नेतृत्व से चलता है। इतिहास गवाह है कि कांग्रेस के प्रधानमंत्री अपनी बौद्धिक क्षमता और दूरदर्शिता के लिए जाने जाते थे। क्या आज की ‘धर्म आधारित’ राजनीति विकास के असली मुद्दों को दबा रही है?
- विदेशी नीति: दबाव या दबदबा?
1971 के युद्ध का वह दौर याद किया जा रहा है जब तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी ने अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन की धमकी के आगे झुकने से इनकार कर दिया था। उनका वह स्पष्ट संदेश—”अमेरिका हमारा दोस्त हो सकता है, बॉस नहीं”—आज भी भारतीय स्वाभिमान की मिसाल है।
- महंगाई और अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की चुनौती
पूर्व पीएम मनमोहन सिंह के दौर का जिक्र करते हुए यह तर्क दिया जा रहा है कि तब कच्चे तेल की कीमतें 142 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँचने के बावजूद आम जनता पर पेट्रोल-डीज़ल का बोझ नहीं डाला गया था। आज की तुलना में वह प्रबंधन ‘जन-हितैषी’ नजर आता है।
- आर्थिक प्रबंधन और सोने की राजनीति
साल 2013 में जब रुपया गिरा, तब रघुराम राजन और मनमोहन सिंह की जोड़ी ने FCNR(B) स्कीम के जरिए $34 बिलियन जुटाकर अर्थव्यवस्था को संभाला था। वहीं, हालिया चर्चाओं में 38 टन सोना बेचने के बावजूद सुधार न होने पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
- धर्म बनाम विज्ञान का विकास
कांग्रेस की नीति हमेशा शिक्षा और विज्ञान (ISRO, IIT, AIIMS) के जरिए विकास को अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाने की रही है। क्या हम आज वैज्ञानिक दृष्टिकोण को पीछे छोड़कर केवल भावनाओं की राजनीति में उलझ गए हैं?
- भ्रष्टाचार के आरोप: सच या षडयंत्र?
साल 2012-13 में अन्ना हजारे आंदोलन और ‘2G-कोयला’ जैसे जिन आरोपों के आधार पर कांग्रेस की सत्ता गई, उनमें से कई अदालत में साबित नहीं हो पाए। क्या वे आरोप केवल सत्ता हथियाने का एक सुनियोजित ‘शतरंज का खेल’ थे?
- चुनावी चंदा और उद्योगपतियों का प्रभाव
भाजपा के 10,000 करोड़ से अधिक के चुनावी चंदे पर भी सवाल उठ रहे हैं। क्या उद्योगपतियों द्वारा दिया गया यह भारी भरकम चंदा अंततः जनता की जेब से ही वसूला जा रहा है?
निष्कर्ष : इतिहास का न्याय
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के वे शब्द आज सोशल मीडिया पर बार-बार दोहराए जा रहे हैं—”इतिहास मेरे प्रति अधिक दयालु रहेगा।” क्या वाकई जनता अब महंगाई और बेरोजगारी की ‘भट्ठी’ में जलते हुए पुराने दौर को याद करने लगी है?
‘महानगर मेट्रो’ के इस विशेष लेख का उद्देश्य किसी पक्ष का समर्थन करना नहीं, बल्कि जनता के बीच चल रहे इन सवालों को मंच देना है। समझदार के लिए इशारा ही काफी है!

