Homeआर्टिकलसंपादकीय : वक्त की कसौटी और रिश्तों की असलियत

संपादकीय : वक्त की कसौटी और रिश्तों की असलियत

वक्त को बुरा कहना आसान है, लेकिन यही वह आईना है जो चेहरों से नकाब उतार देता है।

कहा जाता है कि इंसान की पहचान उसके अच्छे दिनों में नहीं, बल्कि उसके सबसे कठिन दौर में होती है। अक्सर हम अपने बुरे वक्त को कोसते हैं, उसे अपनी किस्मत का दोष मानते हैं और ईश्वर से शिकायत करते हैं कि “मेरे साथ ही ऐसा क्यों?” लेकिन अगर गहराई से सोचा जाए, तो बुरा वक्त हमारे जीवन का सबसे बड़ा शिक्षक होता है। यह वह दौर है जो हमें दुनिया की भीड़ में यह पहचानना सिखाता है कि कौन हमारा अपना है और कौन केवल परछाई बनकर साथ चल रहा था।

असलियत का आईना है बुरा वक्त

अच्छे वक्त में तो हर कोई हाथ मिलाने को बेताब रहता है। सफलता की चमक में अनजान भी रिश्तेदार बन जाते हैं और महफिलें सजने लगती हैं। लेकिन जैसे ही वक्त की करवट बदलती है, बहुत से हाथ पीछे खिंच जाते हैं। जो कल तक कसीदे पढ़ते थे, वही आज मुंह फेर लेते हैं। ऐसे में वक्त को बुरा कहना गलत होगा, क्योंकि इसी वक्त ने हमें उन ‘सफेदपोश’ चेहरों की असलियत दिखाई है, जिन्हें हम अपना समझकर बैठे थे।

भीड़ कम होती है, तो सादगी दिखती है

बुरे वक्त का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह हमारे जीवन से फालतू की भीड़ को साफ कर देता है। जब संकट के बादल मंडराते हैं, तब जो मुट्ठी भर लोग आपके साथ खड़े रहते हैं, वही आपके जीवन की असली पूंजी हैं। वक्त हमें बताता है कि रिश्ते खून से नहीं, बल्कि साथ निभाने की नीयत से बनते हैं। यह हमें आत्मनिर्भर बनाता है और सिखाता है कि दुनिया में खुद के पैरों पर खड़ा होना ही सबसे बड़ी जीत है।

वक्त की मार नहीं, वक्त का सबक

वक्त कभी बुरा नहीं होता, वह केवल एक चक्र है जो निरंतर चलता रहता है। जिसे हम ‘बुरा वक्त’ कहते हैं, वह असल में आत्ममंथन का समय होता है। यह हमें हमारी गलतियों का अहसास कराता है, हमारे धैर्य की परीक्षा लेता है और हमें भविष्य के लिए और अधिक मजबूत बनाता है। अगर जीवन में चुनौतियां न आएं, तो हमें कभी अपनी ताकत का अंदाजा ही न हो।

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