विशेष राजनीतिक विश्लेषण : अहमदाबाद | महानगर ब्यूरो
गुजरात की राजनीति में इन दिनों एक पुरानी चर्चा फिर से गर्म है। सत्ता के गलियारों में साल 2016 के उस घटनाक्रम को याद किया जा रहा है, जिसने सूबे की पहली महिला मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल की कुर्सी छीन ली थी। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या वर्तमान भूपेंद्र पटेल सरकार के सामने भी वैसी ही स्थितियां पैदा हो रही हैं, जैसी आनंदीबेन के इस्तीफे से पहले थीं?
जब अमित शाह ने संभाला था ‘ऑपरेशन गुजरात’
साल 2016 का वह दौर याद कीजिए, जब आनंदीबेन पटेल मुख्यमंत्री थीं। स्थानीय निकाय चुनावों (Local Body Elections) में भाजपा को भारी नाराजगी का सामना करना पड़ा था। ग्रामीण इलाकों में पार्टी की पकड़ ढीली होती दिख रही थी। तब कहा गया था कि राज्य चुनाव आयोग की ढील ने भले ही सरकार को कुछ वक्त के लिए बचा लिया हो, लेकिन दिल्ली की नजरें सब देख रही थीं।
सूत्रों के मुताबिक, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह अहसास हुआ कि मतदाताओं की नाराजगी 2017 के विधानसभा चुनाव में हार का कारण बन सकती है, तब उन्होंने अमित शाह को ‘ऑपरेशन गुजरात’ की जिम्मेदारी सौंपी। नतीजा यह हुआ कि आनंदीबेन पटेल को पद से हटा दिया गया और सत्ता की कमान बदली गई।
भूपेंद्र पटेल सरकार: क्या फिर वही चुनौती?
आज राजनीति के जानकर वर्तमान सरकार की तुलना आनंदीबेन सरकार के उस अंतिम दौर से कर रहे हैं। चर्चा है कि:
प्रशासनिक पकड़: क्या नौकरशाही पर सरकार का नियंत्रण वैसा ही है जैसा होना चाहिए?
स्थानीय चुनाव का डर: आगामी स्थानीय चुनावों में अगर जनता की नाराजगी सामने आती है, तो क्या हाईकमान फिर से किसी बड़े ‘सर्जरी’ की तैयारी करेगा?
एंटी-इंकम्बेंसी: लंबे समय से सत्ता में रहने के कारण पैदा होने वाली एंटी-इंकम्बेंसी और कार्यकर्ताओं की अनसुनी क्या भूपेंद्र पटेल के लिए मुश्किल पैदा कर सकती है?
सत्ता के गलियारों में सुगबुगाहट
आनंदीबेन पटेल को ‘स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति’ (उम्र का हवाला देकर) के नाम पर विदा किया गया था। वर्तमान मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल मृदुभाषी और विवादों से दूर रहने वाले नेता माने जाते हैं, लेकिन गुजरात की राजनीति में ‘दिल्ली का फैसला’ हमेशा चौंकाने वाला होता है।

