विशेष रिपोर्ट : मिसाइलों के बाद अब ‘इंटरनेट’ को निशाना बनाने की तैयारी, भारत समेत पूरी दुनिया की उड़ी नींद
नई दिल्ली/दुबई | महानगर ब्यूरो : मध्य पूर्व (Middle East) में जारी संघर्ष अब केवल जमीन, आसमान और तेल के जहाजों तक सीमित नहीं रहा है। युद्ध का यह काला साया अब उस अदृश्य धागे तक पहुँच गया है, जिस पर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और संचार टिका है— यानी ‘समुद्र के नीचे बिछे इंटरनेट केबल्स’। ईरानी मीडिया और सुरक्षा एजेंसियों के हालिया संकेतों ने वैश्विक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में सनसनी मचा दी है।
होर्मुज और लाल सागर: इंटरनेट की जीवनरेखा
लाल सागर और होर्मुज की जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) वे रणनीतिक रास्ते हैं जहाँ से दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण अंडर-सी इंटरनेट केबल्स गुजरते हैं। यदि तनाव बढ़ता है, तो ईरान इन केबल्स को काट सकता है या उन्हें नुकसान पहुँचा सकता है। जानकारों का मानना है कि यह केवल एक सैन्य हमला नहीं, बल्कि एक ‘डिजिटल ब्लैकआउट’ होगा।
भारत के लिए क्यों है यह खतरे की घंटी?
भारत का डिजिटल और बैंकिंग सेक्टर पूरी तरह से इन्हीं अंतरराष्ट्रीय केबल्स पर निर्भर है।
इंटरनेट की गति: यदि लाल सागर के केबल्स को नुकसान पहुँचता है, तो भारत में इंटरनेट की गति ठप हो सकती है।
अर्थव्यवस्था पर चोट: ऑनलाइन बैंकिंग, स्टॉक मार्केट और आईटी सेवाओं का सारा डेटा इन्हीं केबल्स के जरिए ट्रांसफर होता है। एक छोटा सा कट भी अरबों
डॉलर का नुकसान करा सकता है।
संचार संकट: यूरोप और खाड़ी देशों के साथ भारत का सीधा संपर्क कट सकता है।
मिसाइल से ज्यादा घातक है ‘केबल वॉर’
रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि एक मिसाइल किसी एक शहर या ठिकाने को तबाह करती है, लेकिन एक इंटरनेट केबल कटने से पूरा देश ‘ऑफलाइन’ हो सकता है। यह ‘हाइब्रिड वॉरफेयर’ का सबसे खतरनाक रूप है। ईरान जानता है कि पश्चिमी देशों और भारत जैसी उभरતી अर्थव्यवस्थाओं की नसें इन्हीं डिजिटल तारों में छिपी हैं।
वैश्विक सुरक्षा एजेंसियों की चौकसी
इस धमकी के बाद अमेरिका और उसके सहयोगियों ने समुद्री गश्त बढ़ा दी है। पनडुब्बियों और विशेष जहाजों के जरिए इन केबल्स की निगरानी की जा रही है। भारत भी अपनी ‘डिजिटल सिक्योरिटी’ को लेकर सतर्क हो गया है, क्योंकि किसी भी बड़े व्यवधान का असर देश के ‘डिजिटल इंडिया’ अभियान पर सीधा पड़ सकता है।

