नागपुर | विशेष ब्यूरो : जब कानून मौन हुआ, तो ‘शक्ति’ चंडी बन गई
यह कहानी नागपुर के उस काले अध्याय की है, जिसने भारतीय न्याय प्रणाली के इतिहास में एक अमिट छाप छोड़ी। यह कहानी है उस ‘आतंक’ के अंत की, जिसे खाकी का संरक्षण प्राप्त था, लेकिन जब सब्र का बांध टूटा, तो कस्तूरबा नगर की गलियों से उठी महिलाओं की टोली ने अदालत के भीतर ही ‘न्याय’ कर दिया। हम बात कर रहे हैं कुख्यात गुंडे भरत कालीचरण उर्फ अक्कु यादव की, जिसकी रूह कपा देने वाली मौत आज भी चर्चा का विषय है।
आतंक का दूसरा नाम: अक्कु यादव
कस्तूरबा नगर बस्ती के लिए अक्कु यादव किसी बुरे सपने से कम नहीं था।
अपराध का ग्राफ: हत्या, डकैती और फिरौती तो उसके लिए आम बात थी, लेकिन उसका सबसे घिनौना चेहरा महिलाओं के शोषण में दिखता था।
पुलिस की चुप्पी: आरोप थे कि स्थानीय पुलिस के साथ उसकी गहरी मिलीभगत थी। 10 साल तक वह खुलेआम जुल्म करता रहा, शिकायतें हुईं मगर कार्रवाई के नाम पर सिर्फ फाइलें दबी रहीं।
13 अगस्त 2004: कोर्ट रूम बना ‘रणक्षेत्र’
तारीख 13 अगस्त, 2004। नागपुर जिला अदालत में सुनवाई होनी थी। जैसे ही अक्कु यादव को पुलिस घेरे में कोर्ट रूम लाया गया, वहां पहले से मौजूद करीब 200 महिलाओं के भीतर का लावा फूट पड़ा।
लाल मिर्च और पत्थर: महिलाओं ने पुलिस और जज के सामने ही अक्कु पर लाल मिर्च की बुकनी और पत्थरों से हमला बोल दिया।
70 वार और खौफ का अंत: महिलाओं ने छरियों और पत्थरों से उस पर हमला किया। चश्मदीदों के मुताबिक, अक्कु यादव के शरीर पर 70 से ज्यादा घाव किए
गए थे। अदालत परिसर की जमीन खून से लाल हो चुकी थी। पुलिस मूकदर्शक बनी रही और जज अपनी जान बचाने के लिए चेंबर की ओर भागे।
बस्ती का सामूहिक संकल्प: ‘सब दोषी, तो कोई दोषी नहीं’
इस खूनी न्याय के बाद पुलिस ने कई महिलाओं को गिरफ्तार किया। लेकिन मामला तब पेचीदा हो गया जब पूरी बस्ती ने एक सुर में कहा— “अक्कु को हमने मारा है, हम सब अपराधी हैं।” सालों तक चले इस मुकदमे में किसी एक के खिलाफ पुख्ता सबूत नहीं मिल सके। अंततः वर्ष 2012 में कोर्ट ने सबूतों के अभाव में सभी महिलाओं को बरी कर दिया।
महानगर मेट्रो विचार: मजबूरी या अराजकता?
अक्कु यादव की मौत ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया— क्या यह न्याय था? कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह कानून का अपमान था, लेकिन कस्तूरबा नगर की उन पीड़ित महिलाओं के लिए यह ‘आजादी’ का दिन था। जब व्यवस्था पीड़ित को सुरक्षा देने में विफल होती है, तब समाज खुद ‘जज’ बन जाता है, और अक्कु यादव की मौत उसी तंत्र की विफलता का स्मारक है।

