नई दिल्ली/कोलकाता: देश की आंतरिक सुरक्षा और सीमाओं की संवेदनशीलता को लेकर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार को कठघरे में खड़ा किया है। शाह ने दो टूक शब्दों में कहा है कि सीमाओं को सुरक्षित करने के लिए फेंसिंग (बाड़ लगाना) अनिवार्य है, लेकिन बंगाल सरकार जमीन आवंटन में सहयोग न देकर राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ समझौता कर रही है।
फेंसिंग में देरी: मजबूरी या राजनीति?
गृहमंत्री ने कड़े तेवर दिखाते हुए सवाल उठाया कि आखिर सीमा सुरक्षा के काम में यह रुकावट किसके इशारे पर और किसके हित में पैदा की जा रही है? उन्होंने कहा, “घुसपैठ रोकना देश के लिए प्राथमिकता है, लेकिन जब राज्य सरकार जमीन देने में ही आनाकानी करे, तो सुरक्षा एजेंसियां अपने हाथ कैसे मजबूत करें?” राजनीतिक जानकारों का मानना है कि शाह का यह हमला सीधे तौर पर सीमावर्ती इलाकों में हो रही जनसांख्यिकीय बदलाव और अवैध घुसपैठ की ओर इशारा करता है।
सुरक्षा के आगे सहयोग का अभाव
बॉर्डर पर फेंसिंग का काम अधूरा रहने से घुसपैठियों और तस्करों के हौसले बुलंद हैं। गृहमंत्री ने साफ कर दिया कि सीमा सुरक्षा केवल केंद्र का विषय नहीं, बल्कि इसमें राज्य की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि फेंसिंग के बिना घुसपैठ पर पूरी तरह लगाम लगाना असंभव है और बंगाल सरकार का असहयोग राष्ट्रीय अखंडता के लिए चिंता का विषय है।
महानगर मेट्रो का सवाल: देश पहले या वोट बैंक?
इस तीखे प्रहार के बाद एक बड़ा सवाल गूंज रहा है— क्या वोट बैंक की राजनीति देश की सुरक्षा से बड़ी हो गई है? आखिर क्यों अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को सील करने के काम में राजनीतिक गतिरोध पैदा किया जा रहा है?
निष्कर्ष:
गृहमंत्री के इस बयान ने बंगाल की राजनीति में फिर से उबाल ला दिया है। अब देखना यह होगा कि क्या केंद्र के इस दबाव के बाद बंगाल सरकार जमीन के मुद्दे पर अपना रुख नरम करती है या सुरक्षा के मोर्चे पर यह तकरार यूँ ही जारी रहेगी।
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