मुंबई/अहमदाबाद: वर्तमान समय में आम आदमी की स्थिति ‘चक्की के दो पाटों’ जैसी हो गई है। एक तरफ जटिल प्रशासनिक सिस्टम की दीवारें हैं, तो दूसरी तरफ बढ़ता हुआ मानसिक तनाव। हाल ही में विजय शिरोया (#VijayShiroya) के संदर्भ में सोशल मीडिया पर उठी आवाजें इसी कड़वी सच्चाई की ओर इशारा कर रही हैं। सवाल खड़ा होता है कि क्या एक व्यक्ति अपनी परिस्थितियों के लिए खुद जिम्मेदार है, या उसे सिस्टम की कमियों ने इस मोड़ पर लाकर खड़ा किया है?
अक्सर देखा गया है कि जब कोई व्यक्ति न्याय या अपने हक के लिए सिस्टम से लड़ता है, तो भ्रष्टाचार और लालफीताशाही उसे मानसिक रूप से तोड़ देती है। यह केवल आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि एक गहरा मानसिक बोझ बन जाता है। विजय शिरोया के मामले ने इस बहस को पुनर्जीवित कर दिया है कि क्या हमारा समाज और प्रशासन व्यक्ति की मानसिक स्थिति के प्रति संवेदनशील है?
व्यवस्था की विफलता या व्यक्तिगत संघर्ष?
अक्सर ‘सिस्टम का शिकार’ वह व्यक्ति बनता है जिसे सही समय पर मार्गदर्शन और सहयोग नहीं मिलता। मानसिक स्वास्थ्य को आज भी समाज में नजरअंदाज किया जाता है, जबकि सच्चाई यह है कि टूटता हुआ मन व्यवस्था के प्रति आक्रोश का ही परिणाम होता है।
निष्कर्ष:
समय आ गया है कि हम केवल फाइलों और कानूनों को न देखें, बल्कि उस इंसान को देखें जो इनके नीचे दब रहा है। अगर समय रहते व्यवस्था में पारदर्शिता और मानवीय दृष्टिकोण नहीं लाया गया, तो कई और लोग इसी तरह ‘मानसिक बोझ’ तले दबते रहेंगे। प्रशासन को अब ‘फाइल’ के बजाय ‘इंसान’ पर ध्यान देने की जरूरत है।

