नई दिल्ली | राजनीतिक डेस्क
पश्चिम बंगाल चुनाव की तपती सियासत के बीच एक ऐसा सवाल उछला है, जिसने सत्ता के गलियारों से लेकर विपक्षी खेमे तक हलचल मचा दी है।
AAP के राष्ट्रीय संयोजक Arvind Kejriwal ने सीधे प्रधानमंत्री Narendra Modi को चुनौती देते हुए पूछा—
“सभी संस्थाओं पर कब्ज़ा और लाखों वोट कटवाने के बाद भी अगर मोदी जी बंगाल हार गए तो?”
यही एक सवाल अब बंगाल की चुनावी जंग को और ज्यादा रहस्यमयी, मनोवैज्ञानिक और विस्फोटक बना रहा है।
क्या बंगाल में दांव पर सिर्फ एक चुनाव नहीं, बहुत कुछ और है?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि सीधे प्रधानमंत्री की ‘अजेय छवि’ पर निशाना है।
भाजपा ने बंगाल में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है—बड़ी रैलियां, वादों की बारिश, लगातार हमले और सत्ता परिवर्तन का दावा। ऐसे में अगर नतीजे उम्मीद के उलट गए, तो इसका असर सिर्फ राज्य तक सीमित नहीं रहेगा।
यही वजह है कि केजरीवाल का यह सवाल अब सत्ता पक्ष के लिए एक राजनीतिक पहेली बन गया है।
केजरीवाल का वार: सवाल में छिपा बड़ा संकेत
केजरीवाल ने आरोप लगाया कि चुनावी माहौल में संस्थाओं के इस्तेमाल और वोट कटने जैसे मुद्दे गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।
उनके इस बयान को विपक्ष की तरफ से भाजपा पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की रणनीति माना जा रहा है।
सवाल यह नहीं कि बयान कितना तीखा है…
सवाल यह है कि क्या बंगाल का फैसला 2029 की राष्ट्रीय राजनीति का ट्रेलर साबित होगा?
बंगाल की रणभूमि या दिल्ली की धड़कन?
बंगाल में चुनावी माहौल अपने चरम पर है।
लेकिन असली बेचैनी दिल्ली में है।
अगर भाजपा जीतती है तो इसे पूर्वी भारत में बड़ी राजनीतिक एंट्री माना जाएगा।
और अगर हारती है, तो विपक्ष इसे मोदी युग की सबसे बड़ी राजनीतिक दरार बताने में देर नहीं करेगा।
सबसे बड़ा सवाल अभी बाकी है…
क्या यह सिर्फ केजरीवाल का राजनीतिक तंज है?
या फिर बंगाल की जमीन पर कुछ ऐसा पक रहा है, जो देश की राजनीति का रुख बदल सकता है?
अब पूरे देश की नजर सिर्फ एक सवाल पर है—
मोदी अगर बंगाल हार गए, तो क्या सचमुच देश की राजनीति का खेल बदल जाएगा?

