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महानगर मेट्रो विशेष : भूपत भायाणी—AAP के विधायक से BJP के ‘कॉर्पोरेटर’ उम्मीदवार तक! सेवा या सिर्फ सत्ता का मोह?

राजकोट/जूनागढ़ : गुजरात की राजनीति में ‘आया राम, गया राम’ की परंपरा नई नहीं है, लेकिन विसावदर के पूर्व विधायक भूपत भायाणी का राजनीतिक सफर एक बार फिर चर्चाओं के केंद्र में है। आम आदमी पार्टी के टिकट पर विधानसभा चुनाव जीतने वाले भायाणी अब भारतीय जनता पार्टी के झंडे तले स्थानीय निकाय चुनाव में कॉर्पोरेटर उम्मीदवार के तौर पर नजर आने की चर्चा में हैं। इस राजनीतिक यू-टर्न ने मतदाताओं के बीच कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

विधायक की कुर्सी छोड़ी, अब पार्षद की आस!

भूपत भायाणी ने जब विसावदर से ‘झाड़ू’ के निशान पर जीत दर्ज की थी, तब इसे एक बड़ी राजनीतिक क्रांति माना गया था। लेकिन कुछ ही समय बाद उन्होंने ‘अंतरात्मा की आवाज’ का हवाला देते हुए इस्तीफा दिया और भगवा खेमे का दामन थाम लिया।

सवाल साख का : एक नेता जो पूरे विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुना गया था, वह अब एक वार्ड तक सीमित होने को तैयार है? क्या यह जनता के भरोसे के साथ खिलवाड़ नहीं है?

पाले बदलने का खेल: विपक्ष से सत्तापक्ष की ओर बहने वाली यह एकतरफा गंगा क्या वाकई क्षेत्र के विकास के लिए है, या फिर यह व्यक्तिगत राजनीतिक सुरक्षा का कवच है?

महानगर मेट्रो का कड़ा विश्लेषण: ‘बिना पेंदे के लोटे’ या ‘मजबूत रणनीति’?

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि भायाणी का यह कदम उनकी राजनीतिक साख बचाने की कोशिश है या भाजपा की कोई बड़ी रणनीतिक चाल।

  1. विचारधारा का वस्त्र: कल तक जो भाजपा की नीतियों को कोसते थे, आज वही उन्हीं नीतियों के गुणगान कर रहे हैं। क्या जनता इतनी भोली है कि वह इस हृदय परिवर्तन के पीछे की असलियत नहीं समझती?
  2. कार्यकर्ताओं की नाराजगी: भाजपा के पुराने और निष्ठावान कार्यकर्ता जो वर्षों से वार्ड स्तर पर मेहनत कर रहे थे, उनके ऊपर एक ‘आयाती’ नेता को थोपना पार्टी के भीतर भी असंतोष की चिंगारी भड़का सकता है।

जनता की अदालत: क्या मिलेगा जवाब ?

मतदाताओं का कहना है कि जब कोई नेता अपना दल बदलता है, तो वह केवल पार्टी नहीं बदलता, बल्कि उन हजारों लोगों के वोट और विश्वास को भी बदल देता है, जिन्होंने एक विशेष विचारधारा के लिए उसे चुना था।

“विधायक बनकर जो काम विसावदर के लिए नहीं कर सके, क्या वह अब एक कॉर्पोरेटर बनकर कर पाएंगे? या फिर यह सिर्फ सत्ता की मलाई चाटने की एक और जुगत है?”

लोकतंत्र का मजाक या मजबूरी ?

भूपत भायाणी का यह चुनावी दांव यह साबित करता है कि आज की राजनीति में ‘नीति’ गौण होती जा रही है और सत्ता प्राथमिक। अगर मतदाता इन पालाबदलुओं को सबक नहीं सिखाते, तो भविष्य में कोई भी नेता जनता के जनादेश का सम्मान नहीं करेगा।

महानगर मेट्रो का सवाल: क्या आप ऐसे नेताओं पर दोबारा भरोसा करेंगे, जो अपनी कुर्सी के लिए बार-बार वफादारी बदल देते हैं?

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