अहमदाबाद : एक समय था जब भारतीय जनता पार्टी ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ का संकल्प लेकर आगे बढ़ी थी, लेकिन आज की राजनीति की तस्वीर कई नए सवाल खड़े कर रही है। मौजूदा हालात में यह चर्चा तेज है कि भाजपा अब खुद ‘कांग्रेस-युक्त’ होती जा रही है। बड़ा सवाल यही है कि क्या सत्ता की भूख इतनी बढ़ गई है कि विपक्षी विचारधारा को खत्म करने के लिए साम, दाम, दंड और भेद—हर हथकंडा जायज माना जाने लगा है?
एजेंसियों का डर या हृदय परिवर्तन?
देश की जनता के बीच यह चर्चा आम है कि जो नेता कल तक भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों में घिरे थे, भाजपा की ‘वाशिंग मशीन’ में आते ही वे बेदाग कैसे नजर आने लगते हैं।
सीबीआई और ईडी का चक्रव्यूह: आरोप यह भी लग रहे हैं कि केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल केवल विपक्ष को तोड़ने के लिए किया जा रहा है। जो नेता घुटने टेक देता है, वह सत्ता का हिस्सा बन जाता है और जो सरेंडर नहीं करता, उसके खिलाफ कार्रवाई तेज हो जाती है। दबाव की राजनीति: क्या यह लोकतंत्र की स्वस्थ परंपरा है? एक मजबूत लोकतंत्र के लिए एक मजबूत विपक्ष जरूरी माना जाता है, लेकिन सवाल उठ रहा है कि क्या सरकार विपक्ष को पूरी तरह खत्म कर एकतंत्रीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है?
भ्रष्टाचार की नई परिभाषा: अपनों पर मेहरबानी, गैरों पर वार!
एक तरफ भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करने की बातें होती हैं, तो दूसरी तरफ सरकार के कई मंत्रियों पर बड़े-बड़े घोटालों के आरोप लगते रहते हैं।
- जनता के पैसे की बर्बादी: करोड़ों-अरबों रुपये के प्रोजेक्ट्स और योजनाओं में धांधली की खबरें आती हैं, लेकिन जांच की आंच अपनों तक पहुंचते ही ठंडी पड़ जाती है।
- सत्ता का दुरुपयोग: क्या सत्ता का मतलब केवल अपनी तिजोरियां भरना और विरोधियों को कुचलना रह गया है? जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा विकास के बजाय राजनीतिक जोड़-तोड़ में बर्बाद होने की चर्चा है।
महानगर मेट्रो का सीधा सवाल: जनता को जवाब चाहिए!
आज देश का आम नागरिक ठगा हुआ महसूस कर रहा है। वह पूछ रहा है—
क्या देश में विपक्ष का होना अपराध है?
अगर सभी भ्रष्ट नेता भाजपा में शामिल होकर ‘पवित्र’ हो जाते हैं, तो फिर भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का ढोंग क्यों?
क्या आने वाली पीढ़ियों को हम ऐसा लोकतंत्र देंगे, जहाँ सवाल पूछने वालों के लिए केवल जेल की दीवारें होंगी?
“लोकतंत्र तभी तक जिंदा है, जब तक जनता सवाल पूछती है। जिस दिन सवाल बंद हो जाएंगे, उस दिन केवल तानाशाही बचेगी।”
वक्त है जागने का
अगर हम आज भी सत्ता के इस नशे और एजेंसियों के इस खेल पर खामोश रहे, तो याद रखिए कि देश की संपत्ति और स्वाभिमान दोनों को ये कुर्सी के भूखे नेता नुकसान पहुंचा सकते हैं। जनता को अब यह तय करना होगा कि उन्हें ‘कांग्रेस-मुक्त’ या ‘कांग्रेस-युक्त’ भारत चाहिए, या एक ऐसा ‘भ्रष्टाचार-मुक्त’ भारत जहाँ कानून सबके लिए बराबर हो।

