इंदौर के 70 वर्षीय घनश्याम जी ने लकवाग्रस्त शरीर और पत्नी के निधन के बाद अपने चार बच्चों को अकेले पाला, लेकिन बुढ़ापे में उन्हें भोपाल के ‘अपना घर’ वृद्धाश्रम में रहना पड़ा। 4 अगस्त 2026 को उनकी मौत के बाद इंदौर से उनके किसी भी बेटे या बेटी ने अंतिम संस्कार में हिस्सा नहीं लिया। गैरों ने उन्हें मुखाग्नि दी।
इंदौर के रहने वाले 70 वर्षीय घनश्याम जी की भोपाल के वृद्धाश्रम में मौत के बाद जब अपनों ने मुंह मोड़ लिया, तो गैरों ने उनका अंतिम संस्कार किया।
इंदौर: छोटे से मकान में रहकर अपने चार बच्चों को पालने वाले 70 वर्षीय घनश्याम जी की कहानी आज के दौर के आधुनिक रिश्तों की सबसे कड़वी और झकझोर देने वाली सच्चाई उजागर करती है। शरीर के आधे हिस्से में लकवा होने और बोलने में असमर्थ होने के बावजूद उन्होंने अपने जीवन के आखिरी चार साल भोपाल के ‘अपना घर’ वृद्धाश्रम में बिताए। गत 4 अगस्त 2026 को उनका निधन हो गया, लेकिन मौत के बाद भी दो दिनों तक उनका शव अपनों के इंतजार में रखा रहा। इंदौर से उनके दो बेटों और दो बेटियों में से कोई भी न तो उन्हें देखने आया और न ही उनकी अर्थी को कंधा देने पहुंचा।
साइकिल की दुकान से लेकर वृद्धाश्रम तक का सफर
घनश्याम जी के पास कोई बहुत बड़ी जायदाद या अकूत संपत्ति नहीं थी। इंदौर में उनका साइकिल के टायर-ट्यूब का एक छोटा सा कारोबार था और रहने के लिए एक छोटा सा मकान था। जब उनकी पत्नी का निधन हुआ, तब उनकी सबसे छोटी बेटी महज दो साल की थी। उन्होंने अपनी तमाम जरूरतें मारकर अपने दो बेटों और दो बेटियों को पाला-पोसा।
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लेकिन वक्त का पहिया ऐसा घूमा कि जिस घर में कभी बच्चों की किलकारी गूंजती थी, उसी घर से पिता का रिश्ता हमेशा के लिए टूट गया। जब वह चलने-फिरने से लाचार हो गए और उनके शरीर के आधे हिस्से में लकवा मार गया, तो कोई बेटा या बेटी उन्हें संभालने आगे नहीं आया। घनश्याम जी खुद भोपाल के आईएसबीटी बस स्टैंड तक पहुंचे, जहां सामाजिक कार्यकर्ताओं की नजर उन पर पड़ी और वे उन्हें ‘अपना घर’ वृद्धाश्रम ले आए।
मौत के बाद भी नहीं पसीजे अपनों के दिल
वृद्धाश्रम की संचालिका माधुरी मिश्रा बताती हैं कि उन्होंने परिवार से संपर्क के लिए एक फोन नंबर दिया था। आश्रम प्रबंधन ने उनकी मौत के बाद उसी नंबर पर संपर्क करने की कोशिश की लेकिन दो दिन तक किसी ने फोन नहीं उठाया। 4 अगस्त 2026 को जब घनश्याम जी की मौत हुई, तो आश्रम को उम्मीद थी कि मौत की खबर सुनकर शायद इंदौर से कोई अपना खींचा चला आएगा।
शव को सुरक्षित रखने की लंबी व्यवस्था न होने के बावजूद आश्रम ने दो दिन तक इंतजार किया। फोन पर संपर्क करने पर फोन नहीं लगा। इसके बाद पुलिस की मदद से उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया।ूु जिस पिता ने अपनी पूरी जवानी बच्चों की खुशियों पर न्योछावर कर दी, उसे अंतिम विदाई भी उन लोगों ने दी जिनका खून का कोई रिश्ता नहीं था।
संपत्ति के बंटवारे और रिश्तों की कड़वी दरार
यह कहानी सिर्फ बेटों की बेरुखी तक सीमित नहीं है, बल्कि आधुनिक समय में बेटियों के बदलते रवैये को भी सामने लाती है। माधुरी मिश्रा बताती हैं कि बातचीत के दौरान बच्चों की नाराजगी मुख्य रूप से संपत्ति के बंटवारे को लेकर थी। बेटियों का कहना था कि पिता ने सारी संपत्ति बेटों को दे दी, इसलिए वे क्यों आएं। वहीं बेटों का तर्क था कि पिता ने उनके लिए किया ही क्या है।
जब वह जीते जी देखने नहीं आए, उनकी मृत्यु पर नहीं आए, तो अब हम मृत्यु प्रमाण पत्र उनको नहीं देंगे। ऐसे बच्चों का सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए।
माधुरी मिश्रा, संचालिका, अपना घर वृद्धाश्रम
इंदौर के 70 वर्षीय घनश्याम जी ने पत्नी के निधन के बाद अपने चार बच्चों (दो बेटे, दो बेटियां) को अकेले पाला था।
लकवाग्रस्त होने और बेसहारा होने के बाद उन्होंने अपने जीवन के आखिरी चार साल भोपाल के ‘अपना घर’ वृद्धाश्रम में बिताए।
4 अगस्त 2026 को उनकी मौत के बाद इंदौर से उनका कोई भी बच्चा अंतिम संस्कार में शामिल होने नहीं आया।
परिवार ने शव लेने आने से मना करते हुए सिर्फ उनका मृत्यु प्रमाण पत्र (डेथ सर्टिफिकेट) भेजने की मांग की।
आश्रम प्रबंधन ने परिवार के इस रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है और डेथ सर्टिफिकेट देने से इनकार कर दिया है।

