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महानगर मेट्रो विशेष : सत्ता के ‘कुर्सीदास’ और धर्म का अफीम—क्या सचमुच बिक रहा है देश?

अहमदाबाद | विशेष विश्लेषण

सोशल मीडिया पर इन दिनों एक पंक्ति बार-बार सुनाई दे रही है—

“ये कुर्सी के भूखे, देश बेच खाएंगे…”
यह सिर्फ एक गीत की लाइन नहीं, बल्कि उस बेचैनी की गूंज बन चुकी है जिसे आम नागरिक अपने आसपास महसूस कर रहा है।

सवाल सिर्फ सत्ता का नहीं है।

सवाल उस माहौल का है, जहां विचारधारा बदलना अब कपड़े बदलने जितना आसान लगता है, और धर्म को भावनाओं से आगे बढ़ाकर राजनीतिक नशे में बदल दिया गया है।

यही वह बिंदु है, जहां लोकतंत्र की असली परीक्षा शुरू होती है।

सड़क पर जनता भावनाओं में उलझी रहती है, जबकि सत्ता के बंद कमरों में समीकरण बदलते रहते हैं।

मंदिर और मस्जिद के नाम पर माहौल गर्म होता है, बहसें तेज होती हैं, सोशल मीडिया पर ट्रेंड्स बनते हैं—लेकिन इसी शोर के पीछे एक दूसरा खेल भी quietly चलता रहता है।

एक तरफ बड़े उद्योगपतियों और प्रभावशाली वर्ग को राहत मिलने की खबरें सुर्खियां बनती हैं, तो दूसरी तरफ रोजगार, किसानों के मुद्दे और युवाओं की मांगें अक्सर सड़कों पर संघर्ष के रूप में दिखाई देती हैं।

यही विरोधाभास अब आम लोगों के मन में सबसे बड़ा suspense पैदा कर रहा है—
क्या असली मुद्दे जानबूझकर पीछे धकेले जा रहे हैं?

राजनीति का दूसरा सबसे दिलचस्प और रहस्यमयी पहलू है—दल बदल।

कल तक जो नेता एक-दूसरे पर तीखे आरोप लगाते थे, सत्ता के समीकरण बदलते ही वही चेहरे साथ दिखाई देने लगते हैं।
यही वजह है कि जनता के बीच यह धारणा मजबूत हो रही है कि विचारधारा से ज्यादा महत्व अब सिर्फ सत्ता की कुर्सी का रह गया है।

इस पूरे खेल में प्रचार तंत्र की भूमिका भी चर्चा में है।

मीडिया, सोशल मीडिया influencers, कथावाचक, motivational speakers और धार्मिक मंच—सब मिलकर ऐसा narrative बनाते दिखते हैं जिसमें भावनाएं headline बन जाती हैं, जबकि महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और बेरोजगारी जैसे सवाल पीछे छूट जाते हैं।

यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा suspense है—

क्या जनता को भावनात्मक बहसों में उलझाकर असली मुद्दों से दूर रखा जा रहा है?

विश्लेषकों का मानना है कि जब राजनीति और धर्म की सीमाएं धुंधली होने लगती हैं, तो सबसे ज्यादा नुकसान लोकतांत्रिक जवाबदेही को होता है।
क्योंकि उस समय सवाल पूछने वाले कम और भावनाओं में बहने वाले ज्यादा हो जाते हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है—

क्या हम मंदिर-मस्जिद की बहस में उलझकर अपने बच्चों की शिक्षा, अस्पताल, रोजगार और भविष्य को नजरअंदाज कर रहे हैं?
या फिर देश की जनता अब इस परदे के पीछे चल रहे खेल को समझने लगी है?

आने वाले चुनावों में यही सवाल तय करेगा कि देश की राजनीति भावनाओं के सहारे चलेगी, या फिर रोटी, रोजगार और विकास जैसे मुद्दे केंद्र में लौटेंगे।

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