अहमदाबाद/गांधीनगर: गुजरात, जिसे हम ‘डेवलपमेंट का रोल मॉडल’ कहते हैं, वहां इंफ्रास्ट्रक्चर के नाम पर ऐसी डरावनी तस्वीर सामने आ रही है जो देश के हर नागरिक को डराने के लिए काफी है। अगर पिछले 9 सालों के आंकड़ों पर नज़र डालें, तो राज्य में छोटे-बड़े 21 पुल या तो गिर गए हैं या ट्रैफिक के लिए खतरनाक हो गए हैं।
चाहे मोरबी का चक्करदार झूला पुल हो, तापी का वालोड पुल हो, जूनागढ़ का पुल हो या वडोदरा-अहमदाबाद हाईवे पर हुए हादसे हों – हर घटना के बाद जांच के नाम पर कागज काले कर दिए जाते हैं, लेकिन सवाल यह है कि इन हादसों के लिए असल में कौन ज़िम्मेदार है?
सवालों की झड़ी: इस हालात के लिए कौन ज़िम्मेदार है? इस गंभीर मुद्दे पर पाक्को गुजरात न्यूज़ सिस्टम पर कड़े सवाल उठा रहा है:
खराब क्वालिटी का कंस्ट्रक्शन: करोड़ों रुपये के टेंडर पास हो जाते हैं, लेकिन सीमेंट और रॉड में भ्रष्टाचार से पुल की नींव कमजोर हो जाती है। क्या ठेकेदार सिर्फ अपना फायदा देखते हैं?
सरकार और अधिकारियों की लापरवाही: कंस्ट्रक्शन के दौरान सही टेक्निकल इंस्पेक्शन (क्वालिटी चेक) क्यों नहीं किया जाता? क्या डिपार्टमेंट के अधिकारियों को कमीशन मिल रहा है कि वे आंखें मूंद लें?
मेंटेनेंस की भारी कमी: पुल बनने के सालों बाद तक स्ट्रक्चरल ऑडिट क्यों नहीं किया जाता?
सिर्फ प्राकृतिक हालात का बहाना? जब नए बने पुल भी नॉर्मल बारिश या बाढ़ से गिर जाते हैं, तो इसे ‘प्राकृतिक आपदा’ कहकर बचने की कोशिश क्यों की जाती है?
जांच और मुकदमा… फिर सब ठंडा पड़ जाता है!
जब भी कोई पुल गिरता है, तो एडमिनिस्ट्रेशन का एक तय पैटर्न होता है:
- कमेटी (SIT) बनाना।
- छोटे-बड़े कर्मचारियों को सस्पेंड करके खुद को संतुष्ट करना।
- मरने वालों के परिजनों को मुआवजा देने का ऐलान करना। लेकिन, करप्ट पॉलिसी बनाने वाले बड़े कॉन्ट्रैक्टर और बड़े अधिकारी जेल क्यों नहीं जाते? दूसरों के लिए मिसाल बनने वाली सख्त कार्रवाई क्यों नहीं होती? जांच रिपोर्ट सिर्फ सरकारी फाइलों में धूल फांकती हैं और कुछ समय बाद हालात वैसे ही हो जाते हैं।
क्या जनता की जान की कोई कीमत नहीं है?
जब टैक्स देने वाले आम लोग सुबह अपने घरों से निकलते हैं, तो उन्हें पता नहीं होता कि जिस पुल से वे गुजर रहे हैं वह सुरक्षित है या नहीं। सड़कें और पुल सिर्फ सीमेंट-बजरी के स्ट्रक्चर नहीं हैं, बल्कि लाखों जिंदगियों की लाइफलाइन हैं।
महानगर मेट्रो के सूर
विकास के नाम पर कब तक तबाही बेची जाएगी? अगर समय पर करप्ट कॉन्ट्रैक्टर और अधिकारियों को ‘बुलडोजर न्याय’ और उम्रकैद जैसी कड़ी सजा नहीं दी गई, तो कल सुबह इन 21 पुलों का आंकड़ा और भी डरावना रूप ले लेगा। नागरिकों की जान से खेलना बंद करो और कागजों पर नहीं, बल्कि जमीन पर एक मजबूत भारत बनाओ!

