अहमदाबाद | पवन माकन (ग्रुप एडिटर) : राजनीति के अखाड़े में अब पसीने की गंध से ज्यादा ‘डिजिटल परफ्यूम’ की महक जरूरी हो गई है। गुजरात की राजनीति में एक नया ट्रेंड चर्चा का विषय बना हुआ है, जिसने पुराने धुरंधरों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। ‘पाक्को गुजरात’ की विशेष पड़ताल में सामने आया है कि आगामी स्थानीय निकाय चुनावों के लिए बीजेपी ने जो बायोडाटा फॉर्म तैयार किया है, उसमें ‘सोशल मीडिया प्रेजेंस’ को सबसे ऊपर रखा गया है।
बायोडाटा में ‘लाइक्स’ का तड़का: वफादारी पर भारी ‘व्यूज’?
वर्षों से पार्टी के लिए झंडा उठाने वाले और बूथ स्तर पर पसीना बहाने वाले कार्यकर्ताओं के बीच अब एक ही सवाल है— “क्या रील बनाने वाला ही रियल नेता है?” बायोडाटा में अब साफ तौर पर पूछा जा रहा है:
- फेसबुक, इंस्टाग्राम और एक्स (X) पर आपके कितने फॉलोअर्स हैं?
- वॉट्सऐप चैनल पर आपकी पकड़ कितनी है?
- आपकी पोस्ट पर औसतन कितनी इंगेजमेंट आती है?
पार्टी का गणित सीधा है: ‘जो दिखेगा, वही बिकेगा’। हाईकमान का मानना है कि आज का युवा मतदाता स्मार्टफोन पर टिका है, इसलिए नेता का भी वहां होना अनिवार्य है।
अनुभवी बनाम इन्फ्लुएंसर: पुराने जोगियों के उड़े होश
जमीनी स्तर पर काम करने वाले कई वरिष्ठ नेता अब स्मार्टफोन और सेल्फी स्टिक थामे नजर आ रहे हैं। दबी जुबान में एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “हमने गटर और पानी की समस्याओं के लिए लाठियां खाईं, अब क्या 30 सेकंड की रील तय करेगी कि हमने कितना काम किया?” वहीं, दूसरी ओर यह नीति युवा चेहरों के लिए किसी लॉटरी से कम नहीं है। जिनके पास डिजिटल टीम है या जो सोशल मीडिया के खेल को समझते हैं, उनके लिए टिकट की राह आसान होती दिख रही है।
महानगर मेट्रो का सवाल: लोकप्रियता या जमीनी सच्चाई?
डिजिटल होना समय की मांग है, लेकिन इसके कुछ खतरे भी हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता:
- पेड फॉलोअर्स का मायाजाल: क्या महज आंकड़ों के आधार पर टिकट देना सही है? अगर कोई नेता पैसे खर्च कर फॉलोअर्स खरीद ले, तो क्या वह योग्य उम्मीदवार माना जाएगा?
- जनता का काम बनाम फोटो शूट: क्या अब नेता जनता की समस्याएं सुलझाने के बजाय इस बात पर ध्यान देंगे कि फोटो का ‘एंगल’ और ‘लाइटिंग’ कैसी है?
- डिजिटल बनाम रियल वोट: सोशल मीडिया पर ‘हार्ट’ इमोजी देने वाले कितने लोग असल में पोलिंग बूथ तक जाते हैं?
“नेताओं को अब हाथ जोड़ने के साथ-साथ ‘स्वाइप अप’ भी कराना होगा। जो वक्त के साथ ‘अपडेट’ नहीं होगा, वह राजनीति के पन्नों से ‘डिलीट’ हो जाएगा।” — पवन माकन
निष्कर्ष: काम बोलेगा या रील?
बीजेपी का यह ‘डिजिटल प्रयोग’ चुनावी खर्च कम करने और बड़े जनसमूह तक पहुंचने का शॉर्टकट तो हो सकता है, लेकिन पार्टी को यह नहीं भूलना चाहिए कि इंस्टाग्राम पर रील देखना और ईवीएम का बटन दबाना, दो अलग बातें हैं। जनता आज भी काम देखती है, ‘फिल्टर’ नहीं।
आपकी राय: क्या टिकट के लिए ‘डिजिटल रीच’ को पैमाना बनाना सही है? अपनी राय हमें editor@mahanagarmetro.com पर भेजें।

