अहमदाबाद : जब भी देश में कोई लोगों के हक के लिए सड़कों पर उतरता है या उपवास पर बैठता है, तो सोशल मीडिया की ट्रोल आर्मी इसे ‘फैशन’ या ‘स्टंट’ कहकर उनका मज़ाक उड़ाने के लिए दौड़ पड़ती है। कुछ लोग सोनम वांगचुक के 20 दिन लंबे उपवास को भी 2014 के बाद नया फैशन बता रहे हैं। लेकिन, सत्ता के नशे में चूर, उपवास जैसे पवित्र हथियार को ड्रामा कहने वाले कट्टरपंथी शायद भूल गए हैं कि यह भारत है! यहां अहिंसा और आमरण उपवास का इतिहास अंग्रेजों के समय से लेकर आज़ाद भारत की सभी सरकारों को गौरवान्वित करता रहा है।
इंदिरा गांधी से लेकर मनमोहन सिंह सरकार तक… जब भी लोग जागते हैं, सरकार कांपती है!
जिन्हें यह गलतफहमी है कि यह सब 2014 के बाद शुरू हुआ, उन्हें स्टैटिस्टिक्स और हिस्ट्री पर ध्यान देना चाहिए:
1984 (इंदिरा गांधी सरकार): सोनम वांगचुक के पिता ने खुद उस समय की इंदिरा सरकार के खिलाफ मोर्चा संभाला था ताकि लद्दाख के आदिवासियों को शेड्यूल्ड ट्राइब (ST) का दर्जा दिया जा सके और हक लिया जा सके।
2011 (मनमोहन सिंह सरकार): अन्ना हजारे ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर करप्शन के खिलाफ और लोकपाल बिल के मुद्दे पर पूरे देश को जगाया, जिससे कांग्रेस राज की नींव हिल गई।
2018 (मोदी सरकार): इसी BJP सरकार के खिलाफ गंगा मैया की पवित्रता और अस्तित्व को बचाने के लिए प्रोफेसर जी. डी. अग्रवाल (स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद) ने लगातार 111 दिनों तक खाना न खाकर अपनी जान दे दी, लेकिन वे झुके नहीं!
गांधी के ‘सत्याग्रह’ की ताकत: यह आमरण अनशन एक ग्लोबल ब्रांड है! जो लोग उपवास को आम भूख हड़ताल समझने की गलती करते हैं, उन्हें समझना चाहिए कि यह महात्मा गांधी का दिखाया रास्ता है। यह वही हथियार है जिसने न सिर्फ भारत को आज़ादी दिलाई, बल्कि पूरी दुनिया में क्रांति की मशाल जलाई है:
चाहे वो मार्टिन लूथर किंग जूनियर हों, जिन्होंने अमेरिका में काले और गोरे लोगों के बीच भेदभाव के खिलाफ नागरिक अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी,
नेल्सन मंडेला हों, जिन्होंने दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ लड़ाई लड़ी,
या ब्रिटेन में महिलाओं को वोट देने का अधिकार दिलाने की लड़ाई!
ईरान, तिब्बत और आयरलैंड जैसे देशों का इतिहास गवाह है कि जब कानून अंधा हो जाता है, तो उपवास अधिकारियों की आंखें खोल देता है।
सोनम वांगचुक की लड़ाई देश के हित में है, ट्रोलिंग बंद करो!
सोनम वांगचुक आज जंतर-मंतर पर भूखे-प्यासे बैठे हैं, अपने निजी फायदे के लिए नहीं, बल्कि लद्दाख के पर्यावरण, वहां की संस्कृति और देश के लाखों छात्रों के भविष्य (NEET पेपर लीक मामले में) के लिए। देश के नागरिक के तौर पर उनके सपोर्ट में खड़े होने के बजाय, सत्ता की गुलामी में अंधे होकर आंदोलन का मज़ाक उड़ाने वालों को यह समझना चाहिए कि डेमोक्रेसी में जनता, जनता होती है। अगर आज आप जनता की शांतिपूर्ण आवाज़ को दबाने या बदनाम करने की कोशिश करेंगे, तो इतिहास आपको कभी माफ़ नहीं करेगा!

