बंगाली बोलने वाले मुस्लिम परिवारों में नाराजगी: ‘भारतीय होने के बावजूद, पुलिस कार्रवाई के नाम पर हमें बिना किसी हिचकिचाहट के कुचला जा रहा है।’
कानून और इंसानियत के बीच लटकी जिंदगी: सुरक्षा एजेंसियों की सख्त जांच और मजदूर परिवारों की मुश्किलों को दिखाती एक ग्राउंड रिपोर्ट।
अहमदाबाद/सूरत: गुजरात सरकार और सुरक्षा एजेंसियां राज्य में अवैध रूप से रह रहे विदेशी नागरिकों, खासकर बांग्लादेशियों की पहचान करने के लिए ‘ऑपरेशन डेल्टा हंट’ जोर-शोर से चला रही हैं। देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए इस ऑपरेशन को बेहद अहम माना जाता है और इसके तहत कई संदिग्ध लोगों को हिरासत में लेकर डिपोर्ट (देश से बाहर) किया गया है। लेकिन, इस सख्त कानूनी ऑपरेशन के साथ-साथ सोशल मीडिया से लेकर ज़मीनी स्तर तक एक बड़ा सामाजिक और प्रशासनिक विवाद भी गरमा गया है। गुजरात में रहने वाले बंगाली भाषी मुस्लिम परिवारों का दावा है कि उन्हें सिर्फ भाषा और धर्म के आधार पर शक की नज़र से देखा जा रहा है, जिसकी वजह से कानूनी तौर पर भारतीय नागरिक भी डर के साये में जी रहे हैं।
भाषा बनी मुसीबत: क्या बंगाली का मतलब बांग्लादेशी है?
पश्चिम बंगाल के हजारों मुस्लिम मजदूर सालों से गुजरात के अहमदाबाद, सूरत, राजकोट और वडोदरा जैसे बड़े शहरों में रह रहे हैं। ये लोग मुख्य रूप से कंस्ट्रक्शन, हीरा उद्योग, ज़री का काम, सोना बाजार और कबाड़ (स्क्रैप) के कारोबार से जुड़े हैं। ‘ऑपरेशन डेल्टा हंट’ शुरू होने के बाद ज़मीनी हालात ऐसे हो गए हैं कि जो कोई भी बंगाली बोलता है, उसे अपने आप बांग्लादेशी मान लिया जाता है। पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद, मालदा या चौबीस परगना जिलों से कानूनी तौर पर रोजी-रोटी कमाने आए भारतीय मुसलमानों की शिकायत है कि आधार कार्ड, वोटर आईडी और पैन कार्ड होने के बावजूद उन्हें स्थानीय स्तर पर और पुलिस जांच के दौरान भारी उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है।
मजदूर परिवारों का दर्द: ‘दस्तावेज होने के बावजूद डर का माहौल’
‘महानगर मेट्रो ‘ की एक ग्राउंड रिपोर्ट के मुताबिक, सूरत और अहमदाबाद की झुग्गियों और मध्यम वर्गीय इलाकों में रहने वाले बंगाली मुस्लिम परिवारों के बीच फिलहाल काफी भ्रम और बेचैनी है। नाम न बताने की शर्त पर एक मज़दूर ने कहा, “हम पीढ़ियों से भारत में रह रहे हैं, हमारे पास भारतीय नागरिकता का पक्का सबूत है। लेकिन जब भी रात में पुलिस की चेकिंग या रेड होती है, तो हमारा पूरा परिवार घबरा जाता है। भाषा के अंतर की वजह से मकान मालिक घर खाली करवा रहे हैं और फ़ैक्ट्री मालिक उन्हें काम पर रखने से डर रहे हैं। अपराधियों को तो पकड़ा जाना चाहिए, लेकिन इसकी आड़ में गरीब मज़दूरों की रोज़ी-रोटी नहीं छीनी जानी चाहिए।”
सुरक्षा एजेंसियों का पक्ष: ‘दस्तावेज़ों की जांच ज़रूरी है’
दूसरी ओर, पुलिस और गृह विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि ‘ऑपरेशन डेल्टा हंट’ किसी खास समुदाय के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है। पश्चिम बंगाल सीमा से भारत में घुसपैठ करने वाले हज़ारों बांग्लादेशियों ने धोखाधड़ी से पश्चिम बंगाल, भारत के पते पर नकली आधार कार्ड, राशन कार्ड और चुनाव कार्ड बनवा लिए हैं। इन्हीं नकली दस्तावेज़ों के आधार पर वे गुजरात में शरण लेते हैं। इसलिए, जब तक पश्चिम बंगाल पुलिस या स्थानीय अधिकारियों द्वारा दस्तावेज़ों की पूरी जांच नहीं हो जाती, तब तक सिर्फ़ दस्तावेज़ दिखाने से किसी को क्लीन चिट नहीं दी जा सकती। गैर-कानूनी तत्व स्थानीय रोज़गार खत्म कर रहे हैं और अपराध भी बढ़ा रहे हैं, इसलिए यह सख़्त रुख ज़रूरी है।
‘पक्को गुजरात’ का संतुलित सवाल: सुरक्षा भी ज़रूरी है, बेगुनाहों की सुरक्षा भी ज़रूरी है!
देश की सुरक्षा से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं किया जा सकता। गैर-कानूनी घुसपैठिए देश के लिए खतरा हैं और उन्हें ढूंढकर बाहर निकालना सरकार का नैतिक और कानूनी कर्तव्य है, जिसमें जनता को भी सहयोग करना चाहिए। लेकिन सिस्टम को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि यह प्रक्रिया इतनी पारदर्शी हो कि ‘गेहूं के साथ घुन भी न पिस जाए’। जो लोग असली भारतीय नागरिक हैं और सिर्फ़ गरीबी के कारण यहां काम करने आए हैं, उनके मानवाधिकारों और रोज़ी-रोटी की सुरक्षा होनी चाहिए। प्रशासन को नकली और असली दस्तावेज़ों में अंतर करने के लिए एक तेज़ और सटीक सिस्टम बनाना होगा, ताकि सुरक्षा का मकसद भी पूरा हो और कोई भी बेगुनाह भारतीय परिवार डर के साये में जीने को मजबूर न हो।

