12 दिनों के संपूर्ण कार्यक्रम करने के बाद अब सबसे बड़ी समस्या और दुविधा उभर कर यह सामने आई कि राजस्थान में घूँघट प्रथा और घर के ज्येष्ठ पुरुषों से महिलाओं की बातचीत न करने की सामाजिक परम्परा के कारण अब घर के पुरुष मुखिया के लिए घर की तीनों बहुओं के लिए प्रश्न यह था कि सासु मां के आकस्मिक निधन के बाद पापाजी से कैसे बात की जाए?
कैसे उनसे बात करके,उनसे बोल उनकी परेशानियों को समझ उनके मन को समझने का प्रयास किया जाए,उन्हें संबल दिया जाए ?
सामाजिक व्यवस्था और समाज की निर्धारित कथित कुरीतियों ( ??) के आगे तीनों बहुओं के सामने बहुत बड़ी परेशानी खड़ी कर दी थी।
अपने पिता तुल्य ससुर जी की माँ तुल्य सासु माँ के जाने के बाद असहाय सी दयनीय हालत देख घर की बड़ी बहू ने सारी कथित सामाजिक बंदिशों को लांघ अपनी मर्यादा में रह अपने ससुर जी के पैर छूकर क्षमा मांगते हुए विवाह के 22 साल बाद पहली बार उनसे सीधा संवाद कर ससुरजी की अविरल अश्रुधारा की साक्षी बनकर बहू से बेटी होने का फ़र्ज़ निभा दिया।
बड़ी बहू की इस पहल ने सामाजिक कानाफूसियों को जमकर हवा भी दी लेकिन फिर भी घर में अचानक आई गम की भयावह काली आँधी के बाद शीतल बयार की सरसराहट अब महसूस होने लगी थी ।
बड़ी बहू के इस फैसले ने दोनों छोटी बहुओं को भी हिम्मत दी और वे भी अपने ससुर जी से सीधे संवाद कर उनकी भीगी पलकों को अपनी भावनाओं से पौंछने में कोई कसर नहीं छोड़ रही।
आज दिवंगत आत्मा ने दूर आसमान से नीचे झाँक कर जब अपनी बड़ी बींदणी के साथ दोनों छोटी बींदणी के इस समर्पण को देखा तब उनकीआँखों में भी ख़ुशी के आँसू छलक धरती पर बारिश की बुंदों में आ गए।
आज बड़ी बहू के साथ दोनों बहुएं सिर पर पल्लू रहकर उनकी दुःख सुख की पीड़ा समझ जाती है।
डॉ सुरेंद्र मीणा

