मध्यप्रदेश के छत्तीसगढ़ में मानसून की दस्तक के साथ ही सांप काटने से 6 लोगों की मौत हो चुकी है। डॉक्टरों के मुताबिक, 80% सांप बिना जहर वाले होते हैं, लेकिन झाड़-फूंक की वजह से होने वाली देरी मरीजों के लिए जानलेवा साबित हो रही है।
रायपुर: छत्तीसगढ़ में मानसून की एंट्री के साथ ही ग्रामीण और वनांचल इलाकों में एक बड़ा मौसमी संकट गहरा गया है। बारिश शुरू होते ही उत्तरी जिलों में सांप के काटने से छह लोगों की दर्दनाक मौत हो चुकी है। दरअसल, भारत सरकार ने सांप के डसने को एक अधिसूचित बीमारी घोषित कर साल 2030 तक इन मौतों को आधा करने का लक्ष्य रखा है। इसके बावजूद, जमीनी हकीकत यह है कि आज भी अस्पतालों में एंटी-स्नेक वेनम की कमी नहीं, बल्कि अंधविश्वास और अस्पताल पहुंचने में होने वाली देरी मरीजों की जान ले रही है।
रायपुर के पं. जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन प्रोफेसर डॉ. योगेंद्र मल्होत्रा के मुताबिक, लगभग 80% सांप जहरीले नहीं होते हैं। जहरीले सांपों के काटने पर भी अगर समय पर इलाज शुरू हो जाए, तो बचने की संभावना बहुत ज्यादा होती है।
नींद में ही पैरालिसिस का शिकार बना देता है ‘करैत’
बारिश के दिनों में सांप पानी से बचने और सूखे व गर्मी की तलाश में इंसानी बस्तियों का रुख करते हैं। डॉ. मल्होत्रा बताते हैं कि विशेषकर ‘करैत’ सांप का डसना बेहद धोखा देने वाला होता है। इसके काटने पर पीड़ित को केवल एक सुई चुभने जैसा अहसास होता है और वह दोबारा सो जाता है। इसका न्यूरोटॉक्सिक जहर धीरे-धीरे श्वसन तंत्र की मांसपेशियों को पैरालिसिस कर देता है, जिससे मरीज की नींद में ही मौत हो जाती है। कई बार मरीज को मृत समझ लिया जाता है, जबकि समय पर वेंटिलेटर सपोर्ट मिलने से उसे बचाया जा सकता है।
बैगा-गुनिया के चक्कर में गंवा रहे कीमती समय
ग्रामीण इलाकों में आज भी लोग डॉक्टर के पास जाने के बजाय स्थानीय बैगा-गुनिया (पारंपरिक ओझा) के पास झाड़-फूंक के लिए जाते हैं। घाव को चूसना, गर्म चीजों से दागना या कसकर पट्टी बांधना जैसी रूढ़िवादी पद्धतियां जहर को रोकने के बजाय इन्फेक्शन और जटिलताओं को बढ़ा देती हैं।
मुआवजे की जानकारी से महरूम हैं आदिवासी
नोवा नेचर वेलफेयर सोसाइटी जैसी संस्थाएं वन विभाग के साथ मिलकर बिलासपुर और कोरबा सर्कल में जागरूकता अभियान चला रही हैं। एक बड़ी प्रशासनिक खामी यह भी है कि सांप काटने से हुई मौत प्राकृतिक आपदा के दायरे में आती है, जिसके तहत पीड़ित परिवार को राजस्व विभाग से 4 लाख रुपये के मुआवजे का प्रावधान है। लेकिन जागरूकता की कमी के कारण सुदूर आदिवासी अंचलों में लोग इस आर्थिक सहायता के लिए आवेदन ही नहीं कर पाते हैं।

