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IKDRC का महाघोटाला: बैंक खातों में सड़ रहा है करोड़ों का पीएम फंड, फिर भी जांच के नाम पर गरीब मरीजों से वसूला जा रहा है कैश!

सीएजी (CAG) ऑडिट की रिपोर्ट में हुआ सनसनीखेज खुलासा; सालों से दबा कर रखी गई है करोड़ों की सहायता राशि

अहमदाबाद : अहमदाबाद के प्रतिष्ठित ‘किडनी डिजीज एंड रिसर्च सेंटर’ (IKDRC) और ‘डॉ. एच.एल. त्रिवेदी इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रांसप्लांटेशन साइंसेज’ (ITS) में इंसानियत को शर्मसार करने वाली एक बहुत बड़ी वित्तीय अनियमितता का पर्दाफाश हुआ है। देश के सर्वोच्च सरकारी ऑडिट विभाग यानी नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट और किडनी डायलिसिस एंड ट्रांसप्लांट फाउंडेशन (KDTF) द्वारा जुटाए गए अकाट्य सबूतों ने अस्पताल प्रबंधन के संवेदनहीन चेहरे को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है।

चौंकाने वाला सच यह है कि प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष (PMNRF) से गरीब मरीजों के ट्रांसप्लांट के लिए स्वीकृत लाखों रुपये अस्पताल के खाते में जमा हो चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद इन लाचार मरीजों से जरूरी जांचों और ब्लड रिपोर्ट्स के नाम पर अवैध रूप से नकद (कैश) वसूला जा रहा है।

केस 1: 21 साल की बेटी से जमा फंड के बाद भी ऐंठे पैसे

एक 21 वर्ष की युवती को उसकी किडनी ट्रांसप्लांट के लिए प्रधानमंत्री राहत कोष से ₹3,00,000/- (तीन लाख रुपये) की भारी-भरकम सहायता राशि मंजूर हुई थी। यह पूरी रकम अस्पताल के खाते में पहले ही क्रेडिट हो चुकी थी। इसके बावजूद अस्पताल प्रशासन ने CBC, ब्लड कल्चर, HIV, HCV और HBsAg जैसी अनिवार्य जांचों के लिए उस गरीब परिवार से ₹4,540/- नगद वसूल लिए। अभी ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया जारी है और ऑपरेशन की तारीख आने तक इस परिवार से 60 से 80 हजार रुपये और कैश ऐंठने की पूरी तैयारी है।

केस 2: ‘जितने धक्के खाने हैं खाओ, फंड नहीं खुलेगा’ — अकाउंट्स विभाग की दादागीरी

एक अन्य मरीज का मामला तो अस्पताल की तानाशाही की पराकाष्ठा है। इस मरीज के नाम पर भी ₹3 लाख का पीएम फंड अस्पताल के पास जमा था। ट्रांसप्लांट से पहले होने वाले बेहद महत्वपूर्ण टेस्ट ‘Flow Cytometric Crossmatch’ (FCM) के लिए उनसे ₹7,000/- नगद लाने को कहा गया। जब मरीज के रिश्तेदारों ने अकाउंट्स ऑफिस में जाकर हाथ जोड़े और गुहार लगाई कि इस पैसे को हमारे स्वीकृत फंड से ही काट लिया जाए, तो वहां बैठे बाबुओं ने बेहद बदतमीजी से जवाब दिया: “यह फंड अभी खुलेगा नहीं… डॉक्टर से लिखवा कर लाओ, और डायरेक्टर साहब ने हां कहा तो शायद खुले; बाकी जितने धक्के खाने हैं खाओ, कोई फायदा नहीं होने वाला।”

CAG का सरकारी बम: ₹30.20 करोड़ पर कुंडली मारकर बैठा है प्रशासन

यह कोई एकाध लापरवाही का मामला नहीं, बल्कि अस्पताल की सोची-समझी लूट की क्रूर क्रोनोलॉजी है। सीएजी (CAG) द्वारा साल 2015 से 2023 तक के खातों की जांच में जो आंकड़े सामने आए हैं, वे किसी के भी होश उड़ाने के लिए काफी हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, 20 अक्टूबर 2023 तक इस संस्थान के पास मरीजों के जमा फंड के रूप में ₹30.20 करोड़ की भारी-भरकम राशि बिना इस्तेमाल के पड़ी हुई थी। इस राशि में से अकेले ₹16.80 करोड़ रुपये सिर्फ प्रधानमंत्री राहत कोष (PMNRF) के थे, जिन्हें अस्पताल प्रबंधन साल 2016 से दबाकर बैठा है।

हैरानी की बात यह है कि जिस एस्टीमेट (अनुमानित खर्च) के आधार पर केंद्र सरकार से यह फंड मंजूर होता है, उसमें ओपीडी जांच और खून के सारे टेस्ट का खर्च पहले से शामिल होता है। इसके बावजूद मरीजों से कैश लिया जाता है और सरकार द्वारा भेजा गया पैसा बैंकों में पड़ा रहता है। सीएजी की रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि ट्रांसप्लांट के लिए आई इस राहत राशि का इस्तेमाल नियमों को ताक पर रखकर, ऑपरेशन के बाद के अन्य खर्चों में गलत तरीके से डायवर्ट कर दिया गया।

गरीब मरीज ब्याज पर लाते हैं पैसा, यह प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि वित्तीय अपराध है: महेश देवानी

KDTF के संस्थापक महेश देवानी ने अस्पताल प्रशासन पर सीधा हमला बोलते हुए कहा है कि, यह कोई छोटी-मोटी क्लर्कियल गलती नहीं है, बल्कि करोड़ों रुपये की गंभीर वित्तीय धोखाधड़ी है। बेचारे गरीब मरीज अस्पताल के बिल भरने के लिए बाहर से भारी ब्याज पर कर्ज लेकर कैश का इंतजाम करते हैं, जबकि सरकार का पैसा बैंक खातों में धूल फांक रहा है। पिछले दो सालों से इस गंभीर विषय पर अस्पताल के बड़े अधिकारियों को लगातार सबूतों के साथ पत्र लिखे गए, लेकिन किसी के कान पर जूं तक नहीं रेंगी।

KDTF ने इस पूरे मामले में वर्तमान निदेशक डॉ. प्रांजल मोदी को लिखित शिकायत भेजकर मरीजों से वसूली गई रकम को तुरंत वापस करने और भविष्य में सहायता राशि का सीधे इस्तेमाल सुनिश्चित करने की सख्त मांग की है। मामले की कॉपियां गुजरात स्वास्थ्य विभाग और मुख्यमंत्री कार्यालय को भी भेजी गई हैं ताकि इस संगठित लूट के जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई की जा सके।

महानगर मेट्रो इस खबर पर अपनी नजर बनाए हुए है। देश के सबसे बड़े अस्पताल परिसरों में से एक में चल रहे इस खेल का अंत कब होगा, यह देखना अभी बाकी है।

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