हिंदू महासभा के स्वामी चक्रपाणि महाराज ने महामहिम को सौंपा ज्ञापन; निष्पक्ष जांच और मूल हिंदू पक्षकारों को जगह देने की मांग उठाई!
नई दिल्ली, 18 जून 2026। अयोध्या के भव्य श्रीराम मंदिर के संचालन और प्रबंधन को लेकर एक बार फिर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन और दशकों लंबे कानूनी संघर्ष में मुख्य भूमिका निभाने वाली अखिल भारत हिंदू महासभा ने अब सीधे देश की महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू का दरवाजा खटखटाया है।
महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और सुप्रीम कोर्ट में श्रीराम जन्मभूमि प्रकरण के मुख्य पक्षकार स्वामी चक्रपाणि महाराज ने राष्ट्रपति महोदया को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपकर सनसनीखेज आरोप लगाए हैं। ज्ञापन में ‘श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ में बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताओं की आशंका जताते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की गई है। साथ ही, बरसों तक कोर्ट में लड़ाई लड़ने वाले मूल हिंदू पक्षकारों को ट्रस्ट से बाहर रखने पर गहरी नाराजगी जताई गई है।
“श्रीराम मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि करोड़ों हिंदुओं की आस्था, संघर्ष और बलिदान का प्रतीक है। इसके संचालन में पूर्ण पारदर्शिता और मूल पक्षकारों की सहभागिता बेहद जरूरी है।” स्वामी चक्रपाणि महाराज, राष्ट्रीय अध्यक्ष (अखिल भारत हिंदू महासभा)
” स्वामी चक्रपाणि महाराज, राष्ट्रीय अध्यक्ष (अखिल भारत हिंदू महासभा) : “करोड़ों रामभक्तों की आस्था के साथ विश्वासघात बर्दाश्त नहीं”
स्वामी चक्रपाणि महाराज ने राष्ट्रपति को भेजे ज्ञापन में साफ कहा है कि विभिन्न माध्यमों से मंदिर में आने वाली दान राशि, देव-द्रव्य, सोना, चांदी और अन्य बहुमूल्य भेंटों के प्रबंधन को लेकर गंभीर अनियमितताओं के आरोप सामने आ रहे हैं। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि यदि इन आरोपों में रत्ती भर भी सच्चाई है, तो यह देश-दुनिया के करोड़ों रामभक्तों की पवित्र आस्था के साथ बहुत बड़ा और गंभीर विश्वासघात होगा। इसकी सच्चाई सामने लाने के लिए एक पारदर्शी और निष्पक्ष जांच होना बेहद अनिवार्य है।
असली हकदारों की अनदेखी का आरोप: “जिन्होंने खून-पसीना बहाया, वे ट्रस्ट से बाहर”
ज्ञापन में इस बात पर गहरा दुख और आक्रोश व्यक्त किया गया है कि जिस राम मंदिर निर्माण के लिए हिंदू महासभा सहित देश के तमाम संतों, विचारकों और अधिवक्ताओं ने दशकों तक कानूनी और सामाजिक लड़ाई लड़ी, उन्हें मंदिर बनने के बाद पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया।
15 अक्टूबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट की मध्यस्थता समिति के सामने हुए ऐतिहासिक समझौते का जिक्र करते हुए स्वामी चक्रपाणि ने कहा कि जिन मूल पक्षकारों के संघर्ष से मंदिर निर्माण का रास्ता साफ हुआ, उन्हें सरकार द्वारा गठित ‘श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ में कोई प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया। यह उन सभी संघर्षशील रामभक्तों के साथ सरासर अन्याय है।
राष्ट्रपति के सामने रखी गईं ये 3 प्रमुख मांगें:
महामहिम राष्ट्रपति से इस मामले में तुरंत हस्तक्षेप करने की अपील करते हुए निम्नलिखित मुख्य मांगें उठाई गई हैं:
जांच समिति में मिले जगह: श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट से जुड़े वित्तीय और अन्य आरोपों की जांच के लिए जो भी समिति गठित हो, उसमें मूल हिंदू पक्षकारों को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए।
ट्रस्ट के पुनर्गठन की समीक्षा: ट्रस्ट की वर्तमान संरचना की दोबारा समीक्षा की जाए और राम मंदिर आंदोलन के मूल हिंदू पक्षकारों को इसमें सम्मानजनक और उचित प्रतिनिधित्व दिया जाए।
अधिवक्ताओं का हो सम्मान: कोर्ट में रामलला का पक्ष मजबूती से रखने वाले और इस ऐतिहासिक निर्णय की नींव तैयार करने वाले अधिवक्ताओं व प्रतिनिधियों को भी ट्रस्ट में स्थान देने पर गंभीरता से विचार हो।
स्वामी चक्रपाणि महाराज ने पूरा भरोसा जताया है कि महामहिम राष्ट्रपति करोड़ों रामभक्तों की भावनाओं और इस राष्ट्रीय विषय की संवेदनशीलता को देखते हुए जल्द ही आवश्यक संवैधानिक कदम उठाएंगी।
ब्यूरो रिपोर्ट: महानगर मेट्रो न्यूज़

