जीवन में जब मुश्किलें और परीक्षाएँ आती हैं, तब मनुष्य अक्सर निराशा में डूब जाता है और ईश्वर से प्रश्न करता है कि, “मैंने किसी का क्या बिगाड़ा है जो मुझे इतनी तकलीफ मिल रही है?” इस प्रश्न का उत्तर भगवान श्रीकृष्ण के इस अद्भुत वचन में छिपा हुआ है।
दुःख मनुष्य को अंदर से गढ़ने (निखारने) का काम करता है। जिस व्यक्ति ने कभी भूख नहीं झेली, वह भूखे की पीड़ा कभी नहीं समझ सकता। जिसने कभी हार का स्वाद नहीं चखा, वह असफल व्यक्ति के आँसू नहीं पोंछ सकता। कृष्ण हमें कठिन परिस्थितियों में डालकर हमारे हृदय को ‘पत्थर’ से ‘मोम’ की तरह कोमल बनाते हैं। हमारा अपना दर्द हमें दूसरों के दर्द के प्रति ‘संवेदनशील’ बनाता है।
जब जीवन में सब कुछ हमारी मर्जी के मुताबिक चल रहा होता है, तब अनजाने में ही हमारे भीतर ‘मैं’ (अहंकार) आ जाता है। दुःख अहंकार पर लगा वह घाव है
जो हमें जमीन से जोड़ता है। जब हम खुद को असहाय महसूस करते हैं, तभी हमारे अंदर दूसरों की लाचारी के प्रति आदर और दया जागती है। कृष्ण हमें तोड़ते नहीं हैं, बल्कि हमें नरम बनाते हैं ताकि हम समाज में प्रेम और अपनापन बाँट सकें।
“वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीड़ पराई जाणे रे” (अर्थात् सच्चे भक्त वही हैं जो दूसरों की पीड़ा को समझते हैं)। भगवान हमें वही सच्चा इंसान बनाना चाहते हैं। जिसने खुद कभी ठोकर नहीं खाई, वह रास्ते में पड़े पत्थर की तकलीफ को नहीं समझेगा। हमारा व्यक्तिगत दुःख हमें दूसरों के रास्ते से काँटे हटाने की प्रेरणा और शक्ति देता है।
जैसे एक सुनार जब सोने को आग में तपाता है, तब उसका उद्देश्य सोने को नष्ट करना नहीं होता, बल्कि उसकी अशुद्धियों को दूर कर उसे शुद्ध और अधिक चमकदार बनाना होता है। इसी तरह, ईश्वर हमें मुसीबतों की आग में इसलिए तपाते हैं ताकि हमारे हृदय की ‘स्वयं-केंद्रितता’ (स्वार्थ) जल जाए और दूसरों के लिए ‘शुद्ध करुणा’ पैदा हो।
आज के इस भागदौड़ और प्रतिस्पर्धात्मक युग में लोग एक-दूसरे के प्रति संवेदनशीलहीन होते जा रहे हैं। कृष्ण का यह विचार हमें ‘मानवीय संबंध’ (Human Connection) सिखाता है। जो व्यक्ति अपने दुःख को हँसते हुए स्वीकार करके दूसरों के दुःख में शामिल होता है, वही सही मायनों में ईश्वर का प्रिय बनता है।
पीड़ा ईश्वर का एक ऐसा आशीर्वाद है जो आपके हृदय को दूसरों के लिए धड़कना सिखाता है। आपकी आँखों में जब दूसरों के लिए आँसू आएँ, तब समझना कि आपके भीतर बैठे कृष्ण जाग्रत हुए हैं। जिसके पैर में कभी काँटा नहीं चुभा, वह दूसरों के पैर का काँटा निकालते वक्त कभी सावधानी नहीं बरतेगा। भगवान मुश्किल भूमिकाएँ (Roles) हमेशा अपने सर्वश्रेष्ठ अभिनेताओं को ही देते हैं, क्योंकि वह जानते हैं कि आप ही दूसरों के दुःख के साथ न्याय कर पाएँगे।
भगवान श्रीकृष्ण का यह संदेश हमें जीवन के प्रति सकारात्मक बनाता है। जब भी जीवन में अँधेरा घेरे, तब यह मत सोचो कि “मेरे ही साथ क्यों?”, बल्कि यह सोचो कि “यह अनुभव मुझे किसकी मदद करने के योग्य बनाएगा?”
जिस दिन आप दूसरों के आँसुओं में अपना प्रतिबिंब देखना सीख जाएँगे, उस दिन समझना कि कृष्ण द्वारा दिए गए दुःख का उद्देश्य पूरा हो गया। दुःख अंत नहीं है, बल्कि एक ऐसी समझ की शुरुआत है जो हमें साधारण से ‘श्रेष्ठ’ इंसान बनाती है।
दर्शना पटेल : (नेशनल मेडलिस्ट, नेशनल अवार्ड से सम्मानित) स्पोर्ट्स टीचर।

