सिस्टम के पाप की वजह से अन्नदाता बना सिंघम; सरकारी ऑफिस जाकर अधिकारी को इज्ज़त दिलाने का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल
बेंगलुरु: जब सिस्टम बहरा हो जाता है और सिर्फ़ वादे कानूनी कागज़ों पर रह जाते हैं, तो आम लोगों का गुस्सा कैसे फूटता है, इसकी एक जीती-जागती और जानलेवा कहानी कर्नाटक से सामने आई है। सूखे की मदद की उम्मीद में लंबे समय से सरकारी ऑफिसों के धक्के खा-खाकर थक चुके एक किसान का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। किसान ने ऑफिस में बैठे एक गैर-ज़िम्मेदार सरकारी अधिकारी पर सरेआम चप्पल फेंकी। इस चौंकाने वाली घटना का लाइव वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर वायरल हो रहा है और इसने पूरे देश में एक बड़ी बहस छेड़ दी है।
वादों से तंग आकर अन्नदाता का गुस्से वाला अवतार
मिली जानकारी के मुताबिक, कर्नाटक के इस किसान की ज़मीन सूखे की वजह से पूरी तरह बर्बाद हो गई थी। किसान सरकार द्वारा घोषित आर्थिक मदद पाने के लिए महीनों से सरकारी ऑफिस के चक्कर लगा रहा था। ऑफिस में बैठे बाबू हर बार नई तारीख देकर उसे टरका देते थे। रविवार को भी जब अधिकारी ने मदद की रकम को लेकर गोलमोल जवाब दिया तो किसान का कंट्रोल खो गया।
बिना एक पल की झिझक के उसने अपनी चप्पलें निकालीं और सीधे अधिकारी के मुंह पर मार दीं। इससे पहले कि ऑफिस में मौजूद दूसरे लोग कुछ समझ पाते, किसान ने सिस्टम का घमंड चूर कर लिया।
सोशल मीडिया पर ट्रेंड हो रहा वीडियो: लोगों ने कहा, ‘यह तो होना ही था!’
इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर आते ही ‘ट्रेंडिंग’ हो गया है। यूजर्स इस वीडियो को इंस्टाग्राम रील्स और फेसबुक पर शेयर कर रहे हैं। इस मामले पर नेटिजन दो ग्रुप में बंटे हुए हैं:
किसानों का सपोर्ट: ज्यादातर लोग किसानों के गुस्से को सही ठहरा रहे हैं। लोगों का कहना है कि भ्रष्ट और आलसी अधिकारियों के साथ भी ऐसा ही होना चाहिए जो AC केबिन में बैठकर किसानों की मजबूरी का मजाक उड़ा रहे हैं।
लॉ एंड ऑर्डर: कुछ लोग मानते हैं कि कानून हाथ में लेना गलत है, लेकिन ऐसी घटनाओं के लिए एडमिनिस्ट्रेशन की लालफीताशाही जिम्मेदार है। सरकारी लापरवाही के खिलाफ गुस्से का प्रतीक
इस घटना के बाद लोकल एडमिनिस्ट्रेशन में हड़कंप मच गया है। सरकारी कर्मचारियों की यूनियन ने इस हमले का विरोध किया है और किसान के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है, वहीं दूसरी तरफ किसान संगठन ऑफिशियली अन्नदाता की मदद के लिए आ गए हैं। संगठनों ने धमकी दी है कि अगर किसान पर ज़ुल्म हुआ तो कड़ा आंदोलन किया जाएगा। इस घटना ने साबित कर दिया है कि जब सरकार को पेट में गड्ढा और खेत में दरारें नहीं दिखतीं, तो कलम चलाने वाले बाबुओं को चप्पल खाने के लिए तैयार रहना पड़ता है!

